कथित गौरक्षा के नाम पर बने संगठनों पर पूर्ण प्रतिबंध को लेकर दायर की गई याचिका पर सुनवाई के दौरान बुधवार को पांच भाजपा शासित राज्यों और केंद्र सरकार से छह हफ्ते के अंदर जवाब मांगा है. इन राज्यों में उत्तरप्रदेश, राजस्थान, झारखंड, गुजरात और महाराष्ट्र शामिल हैं.

कोर्ट ने याचिकाकर्ता तहसीन पूनावाला की मांग को ठुकरा दिया जिसमें कहा गया था कि हर जिले में गोरक्षकों से जुड़े मामलों की निगरानी के लिए किसी पुलिस अफसर को नियुक्त किया जाए. दरअसल याचिका में कहा गया था कि अगर ऐसी कोई घटना होती है तो उस अफसर को जिम्मेदार ठहराया जाए. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम ऐसा कोई आदेश जारी नहीं करेंगे. पहले केंद्र और राज्यों के जवाब आने चाहिए.

जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच ने कहा कि इस मुद्दे पर अभी कोई विचार नहीं करेंगे. अभी सिर्फ कर्नाटक सरकार ने ही जवाब दिया है. पांच अन्य राज्यों के जवाब आने पर ही बाकी मुद्दों पर विचार होगा. वहीं, बिस्वा गो सुरक्षा वाहिनी ने भी कोर्ट में अर्जी दायर कर पक्ष रखने का मौका मांगा. कोर्ट ने उनकी अर्जी मंजूर कर ली है.

याचिका में कहा गया है कि देश में कुछ राज्यों में गोरक्षा दलों को सरकारी मान्यता मिली हुई है जिससे इनके हौंसले बढ़े हुए हैं. मांग की गई है कि गौरक्षक दलों की सरकारी मान्यता समाप्त की जाए. याचिका के साथ में गौरक्षक दलों की हिंसा के वीडियो और अखबार की कटिंग लगाई गई हैं और अदालत से इनका संज्ञान लेने को कहा गया है.

याचिका में कहा गया है कि गौशाला में गाय की मौत और गोरक्षा के नाम पर गौरक्षक कानून को अपने हाथ में ले रहे हैं. याचिका में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, और कर्नाटक के उस कानून को असंवैधानिक करार देने की गुहार की गई है, जिसमें गाय की रक्षा के लिए निगरानी समूहों के पंजीकरण का प्रावधान है.

याचिका में कहा गया कि गोरक्षा निगरानी समूह कानून केदायरे से बाहर जाकर काम कर रहे हैं. गोरक्षा केनाम पर गौरक्षक अत्याचार कर रहे हैं और उनकेद्वारा किए जाने वाले अपराध न केवल भारतीय दंड संहिता के दायरे में हैं बल्कि एससी/एसटी एक्ट, 1989 के दायरे में भी है. याचिका में ‘सलवा जूदूम (नक्सल विरोधी समूह) मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा वर्ष 2011 में दिए उस फैसले का हवाला दिया गया है जिसमें सलवा जूदूम पर पाबंदी लगाई गई थी.

याचिका में कहा गया कि कानून के तहत मिले संरक्षण की वजह से ऐसे लोग हिंसा भड़काने का काम करते हैं और अल्पसंख्यकों और दलितों पर अत्याचार करते हैं.


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