सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी तरह के उग्र रुख से देश का भला नहीं होगा। शीर्ष अदालत ने कहा है कि हर समूह और हर समुदाय को उदारता बरतने की जरूरत है।

अदालत ने यह भी कहा कि हम सभी देशभक्त हैं और कोई भी मातृभूमि को बदनाम नहीं करना चाहता लेकिन सवाल यह है कि क्या हम किसी भी व्यक्ति को कानून अपने हाथों में लेने की इजाजत दे सकते है? न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर और न्यायमूर्ति एएम सप्रे की पीठ ने कहा कि जब भी अदालत कोई संवेदनशील मामले में सुनवाई करती है तो समाज का हर समूह और वर्ग अपना नजरिया व्यक्त करना चाहता है और लोग विरोध-प्रदर्शन और नारेबाजी कर तनाव बढ़ाने की कोशिश करते हैं।

अदालत ने ये टिप्पणी जेएनयू के पूर्व छात्र एनडी जयप्रकाश की उस याचिका पर सुनवाई कर दौरान की जिसमें मंगलवार को जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार की पेशी के दौरान जेएनयू के छात्र-शिक्षक और पत्रकारों की पिटाई की बात कही गई है। याचिका में कन्हैया की पेशी के दौरान सुरक्षा सुनिश्चित करने की गुहार की गई है।

साथ ही अदालत ने कहा कि हिंसा कहीं नहीं होनी चाहिए चाहें वह अदालत परिसर में हो या कहीं और। पीठ ने कहा कि पुलिस पर दोष लगाना सबसे आसान है। कभी उनकी निष्क्रियता को लेकर तो कभी ज्यादती को लेकर।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकीलों ने पीठ से कहा कि अदालत में हिंसा स्वीकारयोग्य नहीं है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया गया कि जब वहां वकील लोगों की पिटाई कर रहे थे, उस वक्त पुलिस मूकदर्शक बनी बैठी थी। इस पर पीठ ने कहा कि हिंसा कहीं भी हो स्वीकारयोग्य नहीं है। पीठ ने कहा कि पुलिस पर दोष मढ़ना आसान है लेकिन आपको पता ही होगा कि मद्रास में दो वर्ष पहले क्या हुआ था।

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पीठ ने कहा समाज के हर वर्ग को उदारता दिखानी चाहिए। सभी लोग अपना पक्ष रखना चाहते हैं। अगर पुलिस इसमें दखल देती है तो दोनों पक्ष पुलिस पर ज्यादती करने की शिकायत करते हैं और अगर पुलिस दखल नहीं देती है तो कहा जाता है कि पुलिस ने सब कुछ जानते हुए कार्रवाई नहीं की। पीठ ने साफ किया कि हम किसी तरह की हिंसा को न्यायसंगत नहीं बता रहे हैं लेकिन यह भी सच है कि इस तरह की स्थिति में पुलिस की स्थिति सहज नहीं होती है।

वरिष्ठ वकील ने कहा कि पटियाला हाउस कोर्ट में जो स्थिति है उसमें अदालती कार्यवाही नहीं हो सकती। जवाब में पीठ ने कहा कि ऐसा अक्सर होता है जब कोई संवेदनशील मामले में कोर्ट सुनवाई करता है। लोग विरोध-प्रदर्शन करते हैं। मार्च निकालते हैं। नारेबाजी करते हैं। कभी-कभी तो अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने के बावजूद आरोपी के निर्दोष होने के दावे तक किए जाते हैं।

पीठ ने कहा कि इस मामले को छोड़ दिया जाए बल्कि संवेदनशील मामले या उन मामले जिनमें हाईप्रोफाइल लोग शामिल होते हैं, कई बार ऐसा देखा जाता है कि बड़ी संख्या में लोग अदालत आते हैं और तरह-तरह की बात करते हैं। तनाव पैदा करते हैं। पीठ ने स्पष्ट किया कि अगर कोई नारेबाजी करता है तो इसका कतई यह मतलब नहीं है कि कोई कानून को अपने हाथ में ले। पीठ ने कहा कि किसी भी समूह या व्यक्ति को अदालत को अस्थिर करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। अगर आज हम यह स्वीकार करते हैं तो सिस्टम धवस्त हो जाएगा।


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