युवाओं में कट्टरता का भाव हटाने के लिए एमएसओ की एक और ऐतिहासिक पहल:

आतंकवाद को समझे बिना इसे समाप्त करने के जितने भी प्रयास हैं, वह तात्कालिक रूप से तो मदद कर सकते हैं लेकिन उसका सामाजिक बहिष्कार करने के लिए इसके मुक़ाबले उचित विचारधारा को प्रश्रय देना पड़ेगा। इसी मुद्दे पर मुस्लिम स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन यानी एमएसओ की एक दिवसीय राष्ट्रीय परिचर्चा विश्व पुस्तक मेले के दौरान रविवार सुबह प्रगति मैदान के हॉल संख्या 18 में होगी।

एमएसओ के राष्ट्रीय महासचिव शुजात अली क़ादरी ने बताया कि ‘आतंकवाद का हल सूफ़ीवाद’ के मुद्दे पर राष्ट्रीय परिचर्चा में मुख्य वक्ता के तौर पर दूरदर्शन समाचार सम्पादक और पत्रकार केजी सुरेश संबोधित करेंगे। वह अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य के आधार पर समझाएंगे कि किस प्रकार आतंकवाद में धर्म का इस्तेमाल होता है और यदि हम अन्तरराष्ट्रीय घटनाओं की कड़ियाँ मिलाते हैं तो पता चलता है कि धर्म के दुरुपयोग मात्र को रोक देने से सामाजिक स्तर पर बड़ा कार्य किया जा सकता है।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि और सहआयोजक तंज़ीम उलामा ए इस्लाम के राष्ट्रीय अध्यक्श मुफ़्ती अशफ़ाक़ हुसैन क़ादरी बताएंगे कि सूफ़ीवाद से जो लोग भटक कर कहीं और इस्लाम को ले जाना चाहते हैं वह रास्ता ही आतंकवाद की तरफ़ जाता है। वहाबी विचारधारा और इसका आतंकवाद में प्रयोग के मुद्दे पर मुफ़्ती अशफ़ा़क अपने अध्ययन के आधार पर यह साबित करेंगे कि इस्लाम और वहाबी विचारधारा दो अलग-अलग चीज़ें हैं और इस्लाम को बदनाम करने में वहाबी विचारकों ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। यही वजह है कि सूफ़ीवाद में विश्वास करने वाला हर व्यक्ति इंसान बनकर उभरता है जबकि वहाबी विचारों वाले व्यक्ति के साथ हमेशा यह ख़तरा रहता है कि वह कभी भी समाज को नुक़सान पहुँचा सकता है।

पत्रकार और टिप्पणीकार अख़लाक़ उस्मानी भी कार्यक्रम में वक्ता के तौर पर अंतराराष्ट्रीय घटनाक्रम के आधार पर बताएंगे कि कैसे इस्लाम का चोला ओढ़कर ऊर्जा और हथियारों के कारोबारी अपना धंधा चमका रहे हैं। इस कार्यक्रम में एक हज़ार चुनिन्दा श्रोताओं को आमंत्रित किया गया है। कार्यक्रम समाप्ति से पहले श्रोताओं के अपने प्रश्न पूछने और राय बनाने का भी समय दिया जाएगा। शुजात अली क़ादरी ने बताया कि संगठन के उत्तर भारत के कई वरिष्ठ पदाधिकारी राष्ट्रीय परिचर्चा में शरीक होंगे।


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