इस विशेष लेख में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में शोधरत बोस का कहना है कि संसद में अपने भाषण के दौरान स्मृति ईरानी ने बांग्लादेश पर लिखी उनकी किताब का हवाला देकर जो बातें कहीं वे इस किताब में हैं ही नहीं.

संसद में स्मृति ईरानी ने जो कहा वह मेरी किताब में है ही नहीं : शर्मिला बोस

अभिव्यक्ति की आजादी के मुद्दे पर 24 फरवरी, 2016 को मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने संसद में एक जोरदार भाषण दिया. इस दौरान उन्होंने मेरा और मेरी किताब ‘डेड रेकनिंग : मेमोरीज ऑफ द 1971 बांग्लादेश वार का जिक्र भी किया.’ ईरानी की टिप्पणियां कई सवालों के लिए रास्ता बनाती हैं जिनमें एक यह भी है कि अतीत का अध्ययन करने का तरीका क्या हो? ये टिप्पणियां यह भी बताती हैं कि जब विद्वानों, पत्रकारों या विश्वविद्यालयों के छात्रों की सोच और अभिव्यक्ति की आजादी राष्ट्रवाद की धारणाओं से टकराती है तो क्या होता है.

उनके दावे के मुताबिक मैंने लिखा है कि ‘बांग्लादेश मुक्ति संग्राम एक भ्रांति था.’ पाकिस्तान द्वारा खड़े गए और उसी को चोट पहुंचा रहे इस संकट में भारत का दखल सही था या गलत, यह एक अहम सवाल जरूर है लेकिन, मेरी किताब में इस पर चर्चा नहीं की गई है. 

दुर्भाग्य से स्मृति ईरानी ने मेरी किताब का हवाला देकर जो बातें कहीं वे गलत थीं. उनके दावे के मुताबिक मैंने लिखा है कि ‘बांग्लादेश मुक्ति संग्राम एक भ्रांति था.’ पाकिस्तान द्वारा खड़े गए और उसी को चोट पहुंचा रहे इस संकट में भारत का दखल सही था या गलत, यह एक अहम सवाल जरूर है लेकिन, मेरी किताब में इस पर चर्चा नहीं की गई है. यह किताब भारत के बारे में नहीं है. यह एक तहकीकात है जिसका आधार एक व्यापक जमीनी शोध है और जिसमें यह जानने की कोशिश की गई है कि एक साल से कुछ ज्यादा की टकराव वाली उस अवधि के दौरान तब के पूर्वी पाकिस्तान में हुई हिंसा की कुछ चुनिंदा घटनाओं में क्या हुआ था.

ईरानी का यह दावा भी गलत है जिसके मुताबिक मैंने लिखा है कि ‘पाकिस्तान की सेना ने बांग्लादेशियों के साथ कभी कुछ नहीं किया.’ बल्कि किताब तो भयावहता की किसी सूची जैसी है जिसमें आजादी के लिए हुए एक आंदोलन को कुचलने के क्रम में पाकिस्तानी सेना द्वारा की गई ज्यादतियों का जिक्र है. उन यातनाओं का भी जो बांग्ला राष्ट्रवाद के नाम पर बांग्लादेशी राष्ट्रवादियों ने गैर बंगालियों को दीं.

ईरानी ने मेरी किताब का हवाला राष्ट्रविरोधी नारों के आरोप में जेएनयू के छात्रों की गिरफ्तारी के बारे में बात करते हुए दिया था. उन्होंने उन नारों का हवाला भी दिया जो छात्रों ने कथित तौर पर कश्मीर की आजादी और भारत सरकार और सेना के खिलाफ लगाए. ऐसा करते हुए स्मृति ईरानी ने संसद में जोश के साथ भारत माता की जय का नारा भी लगाया.

ईरानी का यह दावा भी गलत है जिसके मुताबिक मैंने लिखा है कि ‘पाकिस्तान की सेना ने बांग्लादेशियों के साथ कभी कुछ नहीं किया.’ बल्कि किताब तो भयावहता की किसी सूची जैसी है

लोकतंत्र का कुल जमा मतलब ही यह है कि एक विचारशील माहौल में सोच के अलग-अलग नजरिये साथ-साथ चल सकें. छात्रों के पास एक ऐसा दिमाग होना जरूरी है जो न सिर्फ सवाल करता रहे बल्कि स्थापित व्यवस्था को चुनौती देता रहे. यह भी जरूरी है कि छात्र विरोधाभासी नजरियों और आपस में टकराते मूल्यों से जूझें. भारत के लिए सबसे अच्छा यह है कि उसे पता रहे कि अतीत की या किसी समकालीन घटना में वास्तव में क्या हुआ था जिसमें घटना से जुड़े अरुचिकर तथ्य और विरोधाभासी नजरिये भी शामिल हों. राष्ट्रवाद, क्षेत्र, धर्म या राजनीतिक विचारधारा की आड़ में छात्रवृत्तियों, पत्रकारों या छात्रों की सक्रियता पर लगाम लगाना स्वतंत्रता और लोकतंत्र के मूल्यों का उल्लंघन है जो भारत के लिए नुकसानदेह है.

मैं समझ सकती हूं कि मंत्री महोदया व्यस्त रहती हैं और शायद उन्हें मेरी किताब पढ़ने का समय नहीं मिला होगा. लेकिन जिस किसी ने भी मेरे बारे में उन्हें जानकारी दी वह शायद दूसरे मुद्दों पर भी भरोसे के लायक न हो. न सिर्फ मेरे काम को गलत तरीके से पेश किया गया बल्कि मेरा ही नाम लेकर मेरे भाई और विपक्ष के एक सांसद पर भी हमला किया गया. क्या यह ठीक और न्यायसंगत है? ईरानी का कहना था कि उन्हें मेरी किताब सोनिया गांधी और राहुल गांधी को भेंट करनी चाहिए. यह बहुत अच्छा विचार है लेकिन, अपनी राय रखने से पहले वे इसे खोलकर पढ़ने की जहमत तो उठाएं. भारत के लोगों के लिए यह कहीं ज्यादा जरूरी है कि उनकी तथ्यों पर आधारित किताबों के एक बड़े दायरे तक पहुंच हो. यह भी कि उनके पास मुश्किल मसलों पर बहस करने की आजादी हो जिनमें राष्ट्रवाद का काला पक्ष भी शामिल है.

(बोस यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड में सीनियर रिसर्च एसोसिएट हैं. यह हमारी सहयोगी वेबसाइट स्क्रोलडॉटइन पर छपी उनकी टिप्पणी का हिंदी अनुवाद है.) (satyagrah)


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