हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला अपनी मौत के बाद जातीय आधार पर होने वाले अन्याय और भेदभाव के ख़िलाफ़ संघर्ष का चेहरा बन कर उभरे हैं. उनकी आत्महत्या के बाद हैदराबाद सहित देश भर में कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं.

26 साल के रोहित हैदराबाद विश्वविद्यालय के रिसर्च स्कॉलर थे और उन्हें विश्वविद्यालय प्रबंधन ने हॉस्टल से निष्कासित कर दिया था. इसके बाद बीते रविवार को उन्होंने विश्वविद्यालय परिसर में अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के बैनर से फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली.

वे आंध्र प्रदेश के गुंटूर ज़िले के ग़रीब परिवार से आते थे. रोहित की मां को अपने बेटे की आत्महत्या की दुखभरी ख़बर तब मिली जब उन्हें अगले सप्ताह रोहित के घर आने का इंतज़ार था.  बेटे को गंवाने के बाद उनकी व्याकुल मां ने बताया, “वह परिवार के लिए रोज़ी रोटी जुटाने वाला इकलौता सदस्य था. विश्वविद्यालय से मिलने वाले पैसे में से कुछ हिस्सा वह घर भेजता था.”

वह कहती हैं, “मेरा बेटा इसलिए मरा क्योंकि कुछ ताक़तवर लोगों ने अपनी ताक़त का ग़लत इस्तेमाल करते हुए उसके ख़िलाफ़ षड्यंत्र किया. कम से कम अब तो उन्हें चार अन्य छात्रों का निलंबन वापस लेना चाहिए.” उनके लिखे अंतिम पत्र को पढ़ने वाले हर शख़्स को उनकी बेहतरीन सोच-समझ और शानदार लेखनी की झलक मिलती है.

उनके नज़दीकी दोस्त पी. विजय रोहित के बारे में बताते हैं, “वह काफ़ी मेहनती और प्रतिभाशाली था. वह काफ़ी दयालु भी था.” विजय के मुताबिक़ रोहित नियमित तौर पर कक्षाओं में शामिल होते और ज़्यादातर समय पुस्तकालय में बिताते थे. विजय कहते है, “जो हुआ है, उस पर यक़ीन नहीं होता. वह दूसरों के लिए प्रेरणास्रोत था. लेकिन वह बहुत संवेदनशील भी था और अपने आसपास की चीज़ों से बहुत उदास भी हो जाता था.”

रोहित विश्वविद्यालय के समाजविज्ञान विभाग से विज्ञान, तकनीकी और समाज पर पीएच.डी कर रहे थे. अपने शानदार अकादमिक करियर के चलते ही उन्हें यूजीसी की जूनियर फ़ेलोशिप और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति समुदाय के लिए दी जाने वाली राजीव गांधी नैशनल फ़ेलोशिप मिली थी. रोहित को क्रांति से जुड़े साहित्य पढ़ने का काफ़ी शौक़ था, वे लेखक भी बनाना चाहते थे.

रोहित ने अपने अंतिम पत्र में अपनी मौत के लिए किसी को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया है. लेकिन इस मामले में ये लग रहा है कि रोहित अपने साथ होने वाले भेदभाव से तंग आ गए थे. उन्होंने विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर को दिसंबर में लिखे पत्र में कहा था कि दलित छात्रों के कमरे में एक रस्सी मुहैया करानी चाहिए. उन्होंने उससे पहले ये भी लिखा था, “हम लोगों को इस तरह अपमानित करने की जगह नामांकन के समय ही हमें ज़हर दे देना चाहिए.”

पिछले कई महीनों से रोहित आर्थिक तंगी का सामना कर रहे थे, क्योंकि उन्हें फ़ेलोशिप का पैसा नहीं मिल रहा था. रोहित ने अपने अंतिम पत्र में लिखा है कि उनके फ़ेलोशिप के 1.75 लाख रुपये बाक़ी है और उन्होंने अपने किसी दोस्त से 40 हज़ार रुपये उधार लिए हुए थे.

उसने अपने दोस्तों से ये सुनिश्चित करने की अपील की है कि पैसा उनकी मां और छोटे भाई को मिल जाए. लेकिन उनके दोस्तों का मानना है कि रोहित अपने साथ होने वाले व्यवहार से आजिज़ आ गए थे. उनके एक दोस्त डी प्रशांत ने कहा, “वह इसलिए भी परेशान था क्योंकि तमाम विरोध प्रदर्शनों का वाइस चांसलर पर कोई असर नहीं हो रहा था और रोहित को उसकी निम्न जाति का एहसास दिलाया जा रहा था.”

वैसे पढ़ाई के साथ-साथ रोहित की कविताओं में भी दिलचस्पी थी. इसके अलावा वे दलित छात्रों के धरना प्रदर्शन में भी हिस्सा लेते थे और पहाड़ियों पर चढ़ने का भी शौक़ था.  डी प्रशांत के मुताबिक, “कैंपस की पहाड़ियां उसके पसंदीदा ठिकाने थे.”

रोहित के साथ विश्वविद्यालय से निलंबित सी. सेशैया इस मामले की शुरुआत के बारे में बताते हैं, “तीन अगस्त को कैंपस में विरोध प्रदर्शन के दौरान झगड़ा हुआ था. एबीवीपी के सदस्यों ने हम पर तब हमला किया जब हम मुज़फ़्फ़रनगर दंगों पर बनी डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म पर बैन लगाए जाने का विरोध कर रहे थे. विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने प्राथमिक जांच में हमें क्लीन चिट दी थी. लेकिन 21 दिसंबर को वाइस चांसलर ने हमें हॉस्टल से निकालने का आदेश जारी कर दिया.”

सेशैया इसके लिए केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को भेजे गए राज्य मंत्री बंडारू दत्तात्रेय के पत्र को ज़िम्मेदार मानते हैं जिसमें इन छात्रों पर वीसी से कार्रवाई करने की मांग की गई थी. वहीं दूसरी ओर एबीवीपी के नेता सुशील कुमार इन आरोपों को ख़ारिज करते हैं. उन्होंने बताया, “उन लोगों ने हम पर हमला किया था, हमने पुलिस से उनकी शिकायत की थी.” साभार: बीबीसी हिंदी

 

 


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