भारतीय लोकतंत्र की कई बार साफ-सफाई कर चुके गांधीवादी नेता अण्णा हजारे ने अब चुनाव चिन्ह का सफाया करने के लिए अभियान छेड़ा है। अण्णा का मानना है कि किसी दल के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ना संविधान विरोधी है.. 

Anna also advocated a strong Lokpal without political interventionभारतीय लोकतंत्र की कई बार साफ-सफाई कर चुके गांधीवादी नेता अण्णा हजारे ने अब चुनाव चिन्ह का सफाया करने के लिए अभियान छेड़ा है। अण्णा का मानना है कि किसी दल के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ना संविधान विरोधी है। हालांकि उनका कहना है कि चुनाव आयोग ने इस सिलसिले में हाथ खड़े कर दिए हैं। फिर भी उनके इस अभियान से उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि को लेकर जनता में बड़े पैमाने पर जागरूकता फैलने की संभावना है, जो लोकतंत्र में बदलाव का बड़ा आधार बन सकता है। चुनाव चिन्ह हटाने के अभियान को आजादी की दूसरी लड़ाई बताते हुए अण्णा हजारे का कहना है कि अपने इस अभियान को तेज करने के सिलसिले में वे इस महीने लखनऊ यात्रा के साथ उत्तर भारत की ओर आ सकते हैं।

रालेगण सिद्धी में एक निर्माणाधीन तालाब के किनारे शाम सवा पांच बजे नीले रंग की पॉलिथीन (वहां लोग इसे कागज कहते हैं) पर पालथी मार कर बैठते हुए अण्णा ने कहा कि संविधान में कहीं भी पक्ष और पार्टी के समूहों द्वारा चुनाव लड़ने का उल्लेख नहीं है। लेकिन फिर भी 1952 के पहले चुनाव से लेकर अब तक पार्टियां संविधान विरोधी चुनाव करती आ रही हैं। उन्होंने कहा कि पार्टियां बदलने से देश में सही परिवर्तन नहीं आएगा। अण्णा ने कहा कि बाबा साहेब आंबेडकर का बनाया संविधान चुनाव के सिलसिले में जब व्यक्ति की बात करता है, तो फिर यह समूह (राजनीतिक दल) कहां से आ गया। देश में लोकतंत्र की स्थापना के लिए वे आजादी की दूसरी लड़ाई का आह्वान करते हुए कहते हैं कि दलीय प्रणाली ने देश में लोकतंत्र आने नहीं दिया है।

उन्होंने कहा कि 1950 में गणतंत्र की स्थापना के बाद सभी पार्टियां रद्द होनी चाहिए थीं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। संविधान के खिलाफ चुनाव घोषित कर दिया गया। पार्टी के आधार पर चुनाव चिह्न देकर चुनाव कराए जाने से रोकने का काम तत्कालीन चुनाव आयोग का था लेकिन वह चुप बैठ गया। दिन भर की कड़ी मेहनत से थके अठत्तर वर्षीय अण्णा ने कहा निश्चित ही आज तक संविधान विरोधी चुनाव हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस बारे में उनकी चार बार चुनाव आयोग से बात हुई है। लेकिन चुनाव आयोग का कहना है कि हम कुछ नहीं कर सकते। यह पहले चुनाव के वक्त होना चाहिए था। अण्णा ने इस सिलसिले में लोगों को जागरूक करने के लिए पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में छह हजार किलोमीटर की यात्रा की है। जनवरी में किसी वक्त वे फिर लखनऊ आ रहे हैं। उनका कहना है कि लोग समझ रहे हैं कि इसके कारण नुकसान हो रहा है। अण्णा इस काम को भले आसान नहीं मानते, लेकिन असंभव भी नहीं मानते। इसके लिए जनता में जागरूकता फैलाना ही उन्हें एकमात्र रास्ता नजर आता है।

उन्होंने कहा कि समूह यानी दल के सत्ता में आ जाने से भ्रष्टाचार बढ़ा है। पार्टी की जगह व्यक्ति चुना जाता तो भ्रष्टाचार इतना नहीं बढ़ता। उन्होंने 2-जी स्पेक्ट्रम, कोयला घोटाला और व्यापमं घोटाले आदि का नाम लेकर कहा कि यह इसलिए हुआ क्योंकि समूह सत्ता में आ गया। अण्णा का मानना है कि समूह के सत्ता में आने से ही जातीय और धार्मिक भेदभाव यानी सांप्रदायिकता भी बढ़ी है। अण्णा ने कहा कि देश का हर गांव विकास से इसलिए वंचित है क्योंकि गांवों में समूह (राजनीतिक दलों) के गुट बन गए हैं। गांव का विकास नहीं होने से देश का विकास रुक गया।

देश में राजनीतिक दलों के गठजोड़ के कारण ही गुंडागर्दी, भ्रष्टाचार और लूट जैसी तमाम बुराइयां पनपी हैं। अण्णा का मानना है कि जिस युवा शक्ति को राष्ट्रशक्ति और देश का भविष्य माना जाता है, वह भी दलीय राजनीति के कारण गुटों में बंट गई है और आपसी झगड़ों में उलझा दी गई है। सूर्यास्त के वक्त अपने सामने बिछी पॉलिथिन पर जमा मिट्टी को हाथ से हटाते हुए अण्णा ने कहा कि लोकशाही के पवित्र मंदिर की सफाई जरूरी है और यह चुनाव चिन्ह हटाए जाने से ही संभव होगा। साभार: जनसत्ता


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