8 नवंबर की आधी रात को देश की सवा अरब जनता से काले धन के खिलाफ जंग की वादा कर प्रधानमंत्री ने नोटबंदी का फैसला लिया था. इस दौरान कई वादे किये थे. लेकिन आरबीआई के आकडे सामने आने के बाद उनका एक भी वादा पूरा होता नहीं दिख रहा है.

पीएम मोदी ने ससे पहला वादा कालेधन पर रोक को लेकर किया था. उन्होंने कहा था कि नोटबंदी से कालाधन पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा. 15 अगस्त, 2017 को  लाल किले की प्राचीर से उन्होंने कहा था, 3 लाख करोड़ रुपया जो कभी बैंकिंग सिस्टम में नहीं आता था, वह आया है. यानि नोटबंदी से आरबीआई को 3 लाख करोड़ रुपये के कालाधन मिला है. लेकिन इसके उलट सिर्फ नोटबंदी के तहत 15.44 लाख करोड़ रुपए में से 15.28 लाख करोड़ रुपए आरबीआई के पास वापस आ गए. यानि सिर्फ 16,000 करोड़ रुपए वापस आये जबकि नोटों की छपाई पर 21,000 करोड़ का खर्च आया है.

नोटबंदी का दुसरा सबसे बड़ा वादा आतंकवाद से निजात का किया गया था. दावा किया गया था कि आतंकी और नक्सली नकली नोटों और काले धन का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. रिजर्व बैंक ने बताया है कि वित्त वर्ष 2016-17 में कुल 7,62,072 जाली नोट पकड़े गए, जो वित्त वर्ष 2015-16 में पकड़े गए 6.32 जाली नोटों की तुलना में 20.4 प्रतिशत अधिक है. इसके अलावा देश ने कई आतंकी और  नक्सली हमले झेले है.

नोटबंदी का तीसरा फायदा बताया गया था कि इससे जाली नोटों ख़त्म होंगे. लेकिन आरबीआई को इस वित्तीय वर्ष में 762,072 फर्ज़ी नोट मिले, जिनकी क़ीमत 43 करोड़ रुपये थी. इसके पिछले साल 632,926 नकली नोट पाए गए थे. यह अंतर बहुत ज़्यादा नहीं है.

एक और वादा ये किया गया था कि नोटबंदी से गरीबों का भला होगा. लेकिन नोटबंदी ने गरीबों का रोजगार छीन लिया. RSS से जुड़े भारतीय मज़दूर संघ और भारतीय किसान संघ के अनुसार देश की 25% आर्थिक गतिविधि पर नोटबंदी का बुरा असर पड़ा है. बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन, छोटे उद्योग और कृषि क्षेत्र में दिहाड़ी मज़दूरों पर नोटबंदी का सबसे बुरा असर पड़ा है. यहाँ तक कि कृषि क्षेत्र भी बुरी तरह से प्रभावित हुआ है.

इसके अलावा कहा गया था कि काला धन आने से देश की तरक्की की होगी. इसके उलट वित्त वर्ष 2017-18 की पहली तिमाही (अप्रेल-जून) में जीडीपी की ग्रोथ तीन साल के न्यूनतम स्तर पर 5.7 पर आ गई हैपिछले वित्त वर्ष 2016-17 की पहली तिमाही में जीडीपी की ग्रोथ 7.9 फीसदी थी.


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