एक हाथ में कुरान एक हाथ में लैपटॉप देने की बात करने वाली मोदी सरकार अल्पसंख्यकों को योजनाओं के नामों के अलावा कुछ नहीं दे पा रही है. अल्पसंख्यकों के लिए बड़ी-बड़ी योजनाओं के बारें में कहा जाता है लेकिन जमीन पर उनकी कोई हकीकत नहीं है.

देश के सबसे बड़े सूबे के तौर पर शुमार किए जाने वाले उत्तरप्रदेश में अल्पसंख्यकों के लिए शुरू की गई पिछली सरकार की कई योजनाएं खत्म की जा रही हैं. देश का अल्पसंख्यक आयोग तो पिछले तीन महीनों से सिर्फ नाम मात्र का ही रह गया है. ऐसा लगता है जैसे भारत का अल्पसंख्यक आयोग भी राम भरोसे ही चल रहा है.

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यूपी के सीएम आदित्यनाथ योगी तो पहले ही साफ कर चुके हैं कि अल्पसंख्यकों के लिए लागू पिछली सरकार की कई नीतियों को गुणदोष और उपयोगिता के आधार पर खत्म किया जाएगा. अब जब बात देश के अल्पसंख्यक आयोग की आती है तो मार्च महीने से आयोग के पास ना तो कोई अध्यक्ष है और ना ही कोई सदस्य. खानापूर्ति के लिए सिर्फ एक आईएएस अफसर सचिव हैं और वे भी लंबे अरसे से मेडिकल लीव पर हैं.

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आखिर अल्पसंख्यकों की बात कौन करे?

आयोग के सूत्रों की मानें तो यूपीए सरकार ने अपने अंतिम दिनों में नसीम अहमद को तीन साल के लिए अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष बना दिया था. मार्च 2017 में उनका कार्यकाल खत्म हो गया और अब तक नया अध्यक्ष नहीं नियुक्त हुआ.

ऐसा नहीं है कि सिर्फ मुसलमानों की स्थितियां खराब हैं. सिख समुदाय के प्रतिनिधि सरदार अजायब सिंह का कार्यकाल डेढ़ साल पहले ही खत्म हो चुका है. मुस्लिम समुदाय की नुमाइंदगी करने वाली फरीदा खान जुलाई 2016 में ही रिटायर हो चुकी हैं. बौद्ध समुदाय के शेरिंग नामग्याल शानू भी पिछले साल ही अपना कार्यकाल पूरा कर चुके हैं. ईसाई समुदाय के मेबल रिबेलो और पारसी प्रतिनिधि दादी मिस्त्री भी इस साल मार्च में रिटायर हो चुके हैं.

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ऐसे में आयोग फिलहाल सिर्फ साइनबोर्ड ही रह गया है. न कोई अध्यक्ष और न ही कोई सदस्य. सचिव अमरेंद्र सिन्हा भी एंजिओग्राफी की वजह से छुट्टी पर हैं. उनसे बात होने पर वे कहते हैं कि अगले आयोग के गठन पर तो सिर्फ पीएमओ ही कुछ कह सकता है.


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