नई दिल्ली | देश में नोट बंदी लागु हुए 60 दिन से ऊपर हो चुके है. प्रधानमंत्री मोदी ने देश से जो 50 दिन मांगे थे वो भी खत्म हो चुके है लेकिन इससे देश को क्या फायदा हुआ, यह सवाल अब भी देश के सामने मुंह बाये खड़ा है. देश की जनता जानना चाहती की जिस कालेधन और भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए देश घंटो लाइन में खड़ा रहा उसका क्या हुआ? आखिर कितना कालाधन सरकार ने पकड़ा और भ्रष्टाचार पर इसका क्या असर हुआ?

हालांकि सरकार अपनी पीठ थपथपाते हुए नोट बंदी को सफल बता रही और वित्त मंत्री अरुण जेटली अप्रत्यक्ष करो का आंकड़ा देकर यह साबित करने का भरपूर प्रयास कर रहे है की नोट बंदी से देश को काफी फायदा पहुंचा है. लेकीन अमेरिका के मशहूर अख़बार ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ का कुछ और ही मानना है. न्यूयॉर्क टाइम्स ने नोट बंदी को लेकर एक आर्टिकल लिखा है. इस आर्टिकल में अख़बार ने नोट बंदी पर कई सवाल खड़े किये है.

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इस आर्टिकल में लिखा गया,’ 8 नवम्बर को भारत में नोट बंदी कर दी गयी. इससे देश की 86 फीसदी करेंसी चलन से बाहर हो गयी. इस कदम से सरकार को उम्मीद थी की काफी कालाधन वापिस नही आएगा और सरकार को कई लाख करोड़ रूपए का राजस्व प्राप्त होगा. सरकार ने 500 और 1000 के नोट बंद करके नए 500 और 2000 के नोट जारी कर दिए.

सरकार के इस कदम से लोगो को काफी परेशानी उठानी पड़ी. लोग घंटो लाइन में लगने के बाद अपना पैसा जमा और निकाल पा रहे थे. वहां हालात अभी भी सुधरे नही है. हालाँकि अगर किसी देश की करेंसी कुछ हफ्तों के लिए चलन से बाहर हो जाये तो इसका मतलब यह नही की वहां की अर्थव्यवस्था बैठ जाती है, लेकिन भारत का मामला थोडा अलग है. यहाँ 98 फीसदी काम कैश में होता है जिसकी वजह से यहाँ नोट बंदी का व्यापक असर पड़ा है.

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देश की अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही है, ऑटो मोबाइल सेक्टर में 16 साल की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गयी है, रियल एस्टेट में भरी गिरावट दर्ज हुई है, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर सिकुड़ रहा है, लोग बेरोजगार हो रहे है. ऐसे में सरकार ने नकद निकासी को सिमित किया हुआ है. एक हफ्ते में केवल कुछ सिमित रकम ही बैंक अकाउंट से निकाली जा सकती है. नोट बंदी के बाद सरकार ने पर्याप्त मात्रा में नए नोटों की छपाई नही की जिससे बाजार में कैश की भारी किल्लत हो गयी.

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आरबीआई के अनुसार नोट बंदी से पहले जहाँ 17 लाख करोड़ रूपए चलन में थे वही 23 दिसम्बर तक केवल 9 करोड़ रूपए वापिस चलन में आये. इससे साफ जाहिर होता है की मोदी सरकार ने नोट बंदी का फैसला गलत तरीके से प्लान और लागू किया. सरकार का दावा है की नए नोटों से करप्शन खत्म होगा लेकिन इसके आसार भी कम ही है क्योकि जैसे ही लोगो के पास पैसे आने शुरू होंगे , यह फिर शुरू हो जायेगा.

यह भी कहा जा रहा है की करीब 97 फीसदी पुराना नोट वापिस बैंकों में आ गया. इसका मतलब है की सरकार कालेधन को पकड़ने में असफल रही या लोगो ने बड़ी मात्रा में टैक्स की हेराफेरी कर अपना पैसा बैंकों में जमा करा दिया.


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