65 साल के बुजुर्ग निराहमद ने बताया कि 2012 में म्यांमा में उपजे हालातों ने जान बचाकर उन्हें भारत में शरण लेने पर मजबूर कर दिया था।

म्यांमा दंगों के समय अपनी जान बचाकर भागकर मथुरा पहुंचे करीब 250 शरणार्थी आज भी खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं। अपने परिवार का पेट भरने के लिए ये शरणार्थी कूड़ा बीन रहे हैं। इन शरणार्थी में सात साल के बच्चे से लेकर सत्तर साल के बुजुर्ग हैं। मथुरा में ये शरणार्थी नारकीय जीवन जीने को मजबूत है। ये शरणार्थी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। 65 साल के बुजुर्ग निराहमद ने बताया कि 2012 में म्यांमा में उपजे हालातों ने जान बचाकर उन्हें भारत में शरण लेने पर मजबूर कर दिया था। म्यांमा में दंगे फैले तो निशाना बने एक ही समुदाय के लोगों को अपनी जान के लाले पड़ गए। म्यांमा में थाना बुसी डोंग के रहने वाले 55 साल के सैयद कुबेर के मुताबिक वे लोग रूहिंगा मुसिलम जाति से संबंध रखते हैं। म्यांमा में उनकी जाति को हमेशा हीन दृष्टि से देखा जाता रहा। वहां की सरकार ने भी उनकी जाति के लिए कुछ नहीं किया। आलम यह था कि बहन-बेटियों को जब चाहे तब अपहरण कर उन्हें अपनी हवस का शिकार बनाने के बाद उनकी हत्या भी कर देते थे।

आठ पास 24 साल के दिल मोहम्मद ने बताया कि 2012 में हुए दंगे के दौरान उसके घर परिवार के लोगों को जान बचाने के लिए जहां रास्ता मिला, वहीं भागे। सभी लोग दो-दो और चार-पांच की संख्या में पहाड़ों के रास्ते होते हुए पहले बांग्लादेश पहुंचे जहां दिहाड़ी पर मजदूरी की। बांग्लादेश में ही रहने वाले एक ठेकेदार ने मानव तस्करी करते हुए उन्हें भारत के ही एक ठेकेदार को बेच दिया। इसके बाद ठेकेदार ने उन्हें जम्मू में शरण दी जहां वे शरणार्थी बन कर रहे। बाद में उसी ठेकेदार ने उन्हें कोलकाता के ठेकेदार के हाथ बेच दिया। इस मानव तस्करी में बुजुर्ग और युवा ही नहीं महिलाएं और बच्चे भी शमिल थे। आज वही ठेकेदार उन्हें मथुरा में ठहराकर कूड़ा-करकट उठवा रहा है।

मथुरा में ग्राम आजमपुर के समीप रूहिंगा मुसिलम जाति के 283 सदस्य सदस्यों के 85 परिवार के रूप में रह रहे हैं। इनके पास न खुद की छत है और न ही पहचान। इन 283 शरणार्थीयों में करीब 100 महिलाएं, 70-80 की संख्या में युवा, एक दर्जन से अधिक बुजुर्ग और बाकी बच्चे शमिल हैं। इनमें युवा और बुजुर्ग और 10 से 12 साल के बच्चे शहर भर कूड़ा बीनते है। महिलाएं और युवतियां प्लास्टिक, गत्ता, कागज और लोहा आदि को अलग करने का काम करती हैं। कूड़ा-करकट बीनने वाला कोई भी सदस्य किसी भी कबाड़ी को सीधा माल नहीं बेच सकता। माल बेचने का अधिकार ठेकेदार सिर्फ अपने पास ही रखता है। भारत में शरणार्थी के रूप में रह रहे रूहिंगा जाति के लोग मूलभूत सुविधाओं से पूरी तरह से वंचित हैं। शरणार्थी अपने बच्चों को दाखिल सरकारी स्कूल ने कर सकते है क्योंकि उसके पास भारत की नागरिकता नहीं है। यही हाल स्वास्थ्य सुविधा का भी है। जहां सरकारी अस्पातल में वे अपने बच्चों का इलाज नहीं करा पाते और निजी अस्पताल में भर्ती कराने के लिए उसके पास पैसे नहीं होते हैं। (Jansatta.com)


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