नई दिल्ली | तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट में पांचवे दिन भी सुनवाई जारी है. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड से सवाल किया की क्या महिलाओं को निकाहनामे में ‘तीन तलाक’ को ना कहने का विकल्प दिया जा सकता है? इस पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल ने कहा की हम बोर्ड के सभी सदस्यो से इस पर सलाह मशवरा करने के बाद जवाब देंगे.

हालाँकि सुबह सुनवाई के दौरान मुस्लिम पर्सनल बोर्ड की तरफ से कहा गया की चूँकि इस्लाम में विवाह एक समझौता है इसलिए महिलाओं के हितो को ध्यान में रखते हुए और उनकी गरिमा की रक्षा के लिए निकाहनामे में कुछ विकल्प जोड़ने का विकल्प खुला हुआ है. अगर महिलाए चाहे तो निकाहनामे में अपनी तरफ से भी कुछ शर्ते रख सकती है. मुस्लिम पर्सनल बोर्ड ने कोर्ट से कहा की तीन तलाक कहने का अधिकार महिलाओं को भी है.

बोर्ड की और से दलील देते हुए कपिल सिब्बल ने कहा की किसी भी मुस्लिम महिला के पास निकाह के समय चार विकल्प होते है. अगर वो चाहे तो अपनी शादी को स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 के तहत भी रजिस्टर्ड कर सकती है. इसके अलावा अपने हितो की रक्षा के लिए महिला को यह भी अधिकार है की वो निकाहनामे में इस्लामी कानून के दायरे में कुछ शर्ते भी जोड़ सकती है. इसमें तलाक की सूरत में मेहर की बहुत ऊँची रकम मांगने जैसे शर्ते भी शामिल है.

इससे पहले जस्टिस जेएस खेहर ने पुछा था की क्या निकाहनामे में महिला को यह विकल्प दिया जा सकता है की वो तीन तलाक को ना कह सके? इसके अलावा कोर्ट ने यह भी पुछा की क्या बोर्ड सभी काजियो को यह निर्देश दे सकता है की निकाह के समय वो इस शर्त को भी निकाहनामे में जगह दे. इस पर कपिल सिब्बल ने कोर्ट में पर्सनल बोर्ड का एक रेजोल्यूशन भी दिखाया जिसमे तीन तलाक को गुनाह करार दिया गया.

इसके अलावा सिब्बल ने कोर्ट में यह भी कहा की तीन तलाक की प्रथा लगभग समाप्ति की और है. अब बहुत कम मुस्लिम लोग इस प्रथा का पालन कर रहे है. ऐसे में जो प्रथा खत्म होने के कगार पर है उसको सवैधानिक तौर पर चुनौती देने से ऐसे हो सकता है की वो फिर से जिन्दा हो जाये. इस दौरान कपिल सिब्बल ने कहा की पर्सनल बोर्ड सुप्रीम कोर्ट के हर सुझाव का स्वागत करता है और उन पर विचार करने का भी आश्वासन देता है.


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