दिल्ली और उत्तर प्रदेश और दिल्ली समेत पूरा हिंदुस्तान अंग्रेजों के बनाये पुलिस एक्ट से मुक्त हो जायेंगे। अब पुलिस अंग्रेजों के कायदे कानून से नहीं, आजाद भारतीय सरकार के कायदे कानूनों से काम करेगी। हिंदुस्तान के लोगों को शायद अब 68 साल बाद अहसास होगा कि पुलिस उनकी हिफाज़त के लिए है। मोदी सरकार पुलिस से वो अधिकार छीनने वाली है जिसका उपयोग अंग्रेज सबसे ज्यादा करते थे। किसी भी व्यक्ति को शक के आधार पर पूछताछ के लिए गिरफ्तार कर लिया जाता था। आज भी ऐसा होता है।

मोदी सरकार पुलिस से पूछताछ के लिए गिरफ्तारी का अधिकार जल्द ही छीनने की तैयारी में है। कानून मंत्रालय इसके लिए दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) में बदलाव करने वाला है। हालांकि गंभीर अपराधों को इसमें शामिल नहीं किया जाएगा। इसके अलावा सरकार अलग बेल एक्ट बनाकर आरोपियों को राहत देने की न्यायालय की विवेकाधीन शक्तियों भी सीमित करने वाली है। मंत्रालय इस मामले में अपने सुझाव कानून आयोग को भेज चुका है। कई देशों की तरह सरकार रेस्टोरेटिव जस्टिस मॉडल अपनाना चाहती है। इसमें जांच शुरू होने से पहले ही पीड़ित कोर्ट की मदद से या अपील के जरिए मामले को सुलझा सकते हैं। कानून मंत्रालय बड़ी संख्या में विचाराधीन कैदियों की रिहाई भी चाहता है।

सरकार घरेलू हिंसा पर कड़े कानून बनाने के पक्ष में है लेकिन दहेज कानून का दुरुपयोग रोकने के भी उपाय किये जा रहे हैं। दहेज उत्पीड़न या दहेज हत्या कि शिकायत आने पर गिरफ्तारी से पहले उसकी विधिवत जांच अनिवार्य किये जाने पर भी विचार हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2014 में गिरफ्तारी के प्रावधान का संयम से इस्तेमाल करने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 498 ए ( दहेज उत्पीडऩ और घरेलू हिंसा) के तहत दर्ज होने वाले मामलों का उदाहरण देते हुए कहा था कि इनमें से बहुत कम मामल ही दोष सिद्ध होते हैं। (News24)


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