नई दिल्ली 2015 में लैंड बिल और दूसरे आर्थिक सुधारों को लेकर बड़ा विरोध झेलने के बाद मोदी सरकार अब फूंक-फूंक कर कदम उठाएगी। सूत्रों के अनुसार नए साल में कम से कम लेबर रिफॉर्म पर सरकार आक्रामक रुख नहीं अपनाएगी। ऐसे में लेबर रिफॉर्म से जुड़े बिल और दूसरे प्रस्तावित कानून को लागू करने की दिशा में सरकार तत्काल आगे नहीं बढ़ेगी।

सूत्रों के अनुसार संसद के आगामी बजट सत्र में लेबर रिफॉर्म से जुड़े बिल पेश करने की संभावना नहीं है। इतना ही नहीं, श्रम मंत्रालय को ऐसे कदम उठाने को कहा गया है जो यह संदेश दें कि सरकार श्रमिक हितों को सपॉर्ट करती है। उद्योग जगत और निवेशक जिन क्षेत्रों में मोदी सरकार से बोल्ड स्टेप लेने की अपेक्षा कर रहे हैं, उनमें लेबर रिफॉर्म भी शामिल है।

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दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनावों में करारी हार के चलते सरकार साल के शुरू में पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, असम और पुड्डुचेरी में होने वाले चुनावों में कोई खतरा नहीं उठाना चाहती। बंगाल और केरल में लेफ्ट एक मजबूत राजनीतिक ताकत है और वे मोदी सरकार पर लगातार हमला कर रही है। वहीं सरकार के आक्रामक लेबर रिफॉर्म का आरएसस समर्थित मजदूर संगठन भी विरोध कर रहा है और इस बारे में भारतीय मजदूर किसान संघ ने औपचारिक पत्र भी लिखा है।

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राजस्थान मॉडल हुआ होल्ड: मोदी सरकार ने पिछले साल राजस्थान में वसुंधरा सरकार के बोल्ड लेबर रिफॉर्म को केंद्र में लागू करने की मंशा जताई थी। इसमें बोनस की सीमा तय करना, छंटनी कानून को सरल बनाने से लेकर पीएफ की कटौती तक बातें थीं। इनका तीव्र विरोध हुआ। विपक्ष को मोदी सरकार पर मजदूर-गरीब विरोधी टैग लगाने का मौका भी मिल गया। सरकार ने इसे ठंडे बस्ते में डालना ही बेहतर समझा।

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न्यूनतम मजदूरी: मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी जरूर मिले, यह सुनिश्चित कराने के लिए सरकार नया कानून बना रही है। इसके तहत सभी फैक्ट्रियों को न्यूनतम मजदूरी इन्फर्मेशन डिस्पले से बतानी होगी। सूत्रों के अनुसार इस बारे में जल्द ही आदेश जारी हो सकता है। सरकार न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है। इसके लिए तमाम लेबर संगठनों से बातचीत भी होगी। सरकार ने कम से कम 15000 रुपए न्यूनतम मजदूरी तय करने का कानून बनाने की योजना तैयार कर रखी है। साभार: नवभारत टाइम्स


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