नई दिल्ली: जेएनयू विवाद के बीच कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि आर्थिक नाकामी को छिपाने के लिए मोदी सरकार देशभक्ति का राग अलाप रही है. कांग्रेस ने आरोप लगाया कि मनमोहन सरकार अर्थव्यवस्था को जिस मुकाम पर ले आई थी. पिछले दो सालों में मोदी सरकार ने उसे मटियामेट कर दिया है.

आर्थिक नाकामी को छिपाने के लिए देशभक्ति का राग छेड़ रही है मोदी सरकार?

दुनिया के आर्थिक संकट का हवाला देकर भारतीय अर्थव्यवस्था के चौकड़ी भरने का पीएम नरेंद्र मोदी कल बयान दे रहे थे, जब वो दिल्ली में स्वामी दयानंद सरस्वती की 140वीं बरसी के कार्यक्रम में शरीक हुए हुए थे. इस दावे के उलट विपक्ष मोदी सरकार को आर्थिक मोर्चे पर नाकाम ठहरा रहा है और आरोप लगा रहा है कि इस नाकामी को छिपाने के लिए बजट से ठीक पहले मोदी सरकार जेएनयू विवाद जैसे मुद्दों को हवा दे रही है.

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ऐसे में सवाल ये है कि क्या वाकई आर्थिक नाकामी को छिपाने के लिए देशभक्ति का राग छेड़ रही है मोदी सरकार?

इस सवाल का जवाब तलाशने से पहले एक नजर अर्थव्यवस्था के आंकड़ों पर. देश की आर्थिक नब्ज बताने वाले शेयर बाजार का सूचकांक सेंसेक्स फिसलकर उस स्तर से भी नीचे पहुंचा हुआ है, जिस स्तर पर मोदी सरकार ने सत्ता संभाली थी.

रुपया भी सबसे निचले स्तर के करीब है. एक डॉलर की कीमत आज 68 रुपए 23 पैसे है. औद्योगिक विकास दर भी लाल निशान दिखा रहा है. मई 2014 में 4.7 फीसदी रहने वाली औद्योगिक विकास दर दिसंबर में माइनस 1.3 फीसदी रही.

इस साल आर्थिक विकास दर यानी जीडीपी का अनुमान भी भी घटाकर सात से साढ़े सात फीसदी के बीच कर दिया गया है. पहले इसके आठ से साढे आठ फीसदी के बीच रहने का अनुमान था.

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सरकारी बैंकों का बढ़ता घाटा भी मोदी सरकार की मुश्किल बढ़ा रहा है. दिसंबर में खत्म तिमाही में आठ सरकारी बैंकों का घाटा कुल मिलाकर दस हजार करोड़ के पार पहुंच गया है.

सरकार ने पिछले बजट में राजस्व घाटा 3.9 फीसदी तक ले आने का अनुमान रखा था. लेकिन एक तो सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी बेचने से उम्मीद से कम कमाई हुई है. वहीं सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के साथ-साथ वन रैंक वन पेंशन के लिए अतिरिक्त प्रावधान करने के मोर्चे पर भी परेशानी है. इसका हल सरकार किस तरह निकालती है, ये तो 29 फरवरी के बजट से साफ हो सकेगा.

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साल 2015-16 में आयकर और कॉरपोरेट टैक्स जैसे डायरेक्ट टैक्स से कमाई में भी 40 हजार करोड़ की कमी आने का अनुमान है. हालांकि पेट्रोल और डीजल पर लगातार एक्साइज ड्यूटी बढ़ाकर और सर्विस टैक्स जैसे इनडायरेक्ट टैक्स से सरकार किसी तरह तय लक्ष्य के मुताबिक कमाई कर पाएगी.

काले धन के मोर्चे पर भी सरकार उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर सकी. विपक्ष के आरोपों के बीच उद्योग जगत भी दबे मुंह कह रहा है कि योजनाएं जारी करने से ज्यादा उनके अमल पर ध्यान देने की जरूरत है.

ऑल इंडिया फेडरेशन के चेयरमैन विकास कलंत्री ने कहा कि योजनाएं जारी करना एक बात है, लेकिन उसे लागू करने में तेजी लाना जरुरी है. (ABP)


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