नई दिल्ली। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी समेत कई अल्पसंख्यक संगठन केंद्र सरकार पर मुस्लिम समाज की पढ़ाई-लिखाई में रोड़ा अटकाने का आरोप लगाते रहे हैं। अब उनकी स्कॉलरशिप को लेकर विवाद हो गया है। मुस्लिम छात्रों का कहना है कि मोदी सरकार ने उनकी स्कॉलरशिप रोक दी है। एम फिल और पीएचडी स्टूडेंट्स के खातों में मौलाना आज़ाद नेशनल फेलोशिप का वज़ीफा नहीं पहुंच रहा है। आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए उन्हें संघर्ष करना पड़ रहा है।

मोदी सरकार मुसलमानों को पढ़ने से रोक रही है

मौलाना आज़ाद नेशनल फेलोशिप रोकी
AMU के रिसर्च स्कॉलर मोहम्मद फुरक़ान का दावा है कि नवंबर 2015 से उनके अकाउंट में स्कॉलरशिप ट्रांसफर नहीं की गई है जबकि यूपीए शासन में हर महीने के पहले हफ्ते में पैसा ट्रांसफर हो जाता था। स्कॉलरशिप जारी करवाने के लिए अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय को चिट्ठी भी लिखी गई लेकिन ना तो जवाब आया और ना ही पैसा।
मौलाना आज़ाद नेशनल फेलोशिप 2010 में यूपीए सरकार ने शुरू किया था। इसमें एम फिल और पीएचडी के अल्पसंख्यक छात्रों के लिए 5 साल तक छात्रवृत्ति की व्यवस्था है।
शिक़ायतकर्ता फुरक़ान अमुवि के बायो केमेस्ट्री डिपार्टमेंट में पीएचडी के स्टूडेंट हैं। उनके मुताबिक जब योजना की घोषणा हुई, तब सभी राज्यों में इसे लागू किया गया लेकिन गुजरात सरकार ने ऐसा करने से इनकार कर दिया था। तब सूबे के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी थी। बाद में हाईकोर्ट के फैसले से गुजरात सरकार योजना लागू करने के लिए बाध्य हुई।
मुस्लिम छात्रों ने ट्वीटर पर अल्पसंख्यक मामलों की केंद्रीय मंत्री नजमा हेपतुल्लाह से इसकी वजह पूछी। जवाब में शनिवार की शाम उन्होंने ताबड़तोड़ आठ ट्वीट करके अल्पसंख्यक कल्याण के लिए चलाई जा रही स्कीमों का ब्योरा दिया।
उनके मुताबिक मंत्रालय ने साल 2016-17 में 90 लाख अल्पसंख्यक छात्रों को स्कॉलरशिप देने का लक्ष्य रखा है। उन्होंने आश्वस्त किया कि मौलाना आज़ाद फेलोशिप बंद नहीं होगी लेकिन अभी स्टूडेंट्स के अकाउंट में रुपया क्यों नहीं पहुंच रहा, इसकी वजह नहीं बताई।
मोदी सरकार बनने के बाद स्कॉलरशिप पहला विवाद नहीं है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को लेकर दो मामलों में गतिरोध पहले से ही चल रहा है। इनमें यूनिवर्सिटी का अल्पसंख्यक दर्जा और ऑफ कैंपसों के लिए फंड पर लगी रोक शामिल है।
सरकार ने AMU के अल्पसंख्यक दर्जे का विरोध किया
2014 में बीजेपी सरकार बनने के बाद सुप्रीम कोर्ट में सरकार की तरफ से कहा गया कि अमुवि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान नहीं है जबकि यूपीए सरकार ने अपने हलफ़नामे में इसके उलट दावा किया था। तब यूपीए सरकार ने कहा था कि 1988 में ही संविधान में संशोधन करके अमुवि को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा दिया जा चुका है।
अल्पसंख्यक दर्जे के मुद्दे पर वीसी ज़मीरुद्दीन शाह नरेंद्र मोदी से लेकर स्मृति ईरानी तक से मिल चुके हैं लेकिन सरकार अपने स्टैंड पर क़ायम है।
शाह का यह भी आरोप है कि स्मृति ईरानी उन्हें मुलाक़ात का वक्त नहीं देतीं। कुर्सी पर बैठने के बाद ईरानी से इसी 10 मार्च को उन्हें दूसरी बार मिलने का समय दिया। इस मीटिंग में स्मृति ईरानी ने साफ़ किया कि सुप्रीम कोर्ट में सरकार का स्टैंड नहीं बदलेगा।
ऑफ कैंपसों को अवैध बताकर बंद करने की धमकी दी
दूसरा मामला अलीगढ़ के ऑफ कैंपसों से जुड़ा हुआ है। स्मृति ईरानी ने इन कैंपसों को अवैध करार देते हुए बंद करने की धमकी दी थी जबकि पांचों कैंपसों की स्थापना एएमयू एक्ट के तहत 2010 में हुई थी जिसे राष्ट्रपति प्रबण मुखर्जी ने मंज़ूरी दी थी।
7 मार्च को अमुवि के स्टाफ क्लब में शाह साफ़ कर चुके हैं कि यूनिवर्सिटी का माइनॉरिटी स्टेटस मुस्लिम समाज के लिए जीने-मरने का सवाल है। सरकार ने अगर फैसला नहीं बदला तो मुस्लिम समाज में इसका ग़लत संदेश जाएगा।
लेकिन हक़ीक़त ये है कि मुस्लिम समाज में संदेश जा चुका है। उनके भीतर यह चिंता घर कर गई है कि मोदी सरकार उनकी पढ़ाई-लिखाई की आज़ादी पर चोट कर रही है। उन्हें पढ़ने और आगे बढ़ने से रोका जा रहा है। (liveindiahindi)

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