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राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने झारखण्ड के लातेहार के बालूमाथ गाँव में दो मुस्लिम पशु व्यापारियों की हत्या कर उनके शव को पेड़ पर टांगने की घटना को लेकर रिपोर्ट पेश कर दी हैं. इस रिपोर्ट में देहरादून से आनेवाला एक व्यक्ति को इस घटना की असल वजह बताया हैं. जो इलाके में 2012 से लातेहार में आकर सांप्रदायिक सौहार्द्र बिगाड़ने का काम कर रहा था.

इसके अलावा रामनवमी के दौरान हजारीबाग में हुए दंगे का मुख्य कारण उत्तेजक नारेबाजी और जुलूस में शामिल लोगों पर प्रशासन का नियंत्रण न होना था. राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने दोनों घटनाओं की जांच के बाद सरकार को भेजी गयी अपनी रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख किया है. आयोग ने दोनों घटनाओं में  पीड़ित पक्षों को मुआवजा देने की अनुशंसा की है.

रिपोर्ट में कहा गया कि पशु व्यवसायियों की हत्या कर पेड़ पर टांगने की घटना से पहले भी इसी व्यक्ति की वजह से वहां पशु व्यवसायियों को प्रताड़ित किया जाता रहा है. उनके साथ पहले भी मारपीट की घटना होती रही है. इस तरह की घटनाओं की शिकायत लेकर पीड़ित पक्ष थाना भी जाया करते थे, लेकिन पुलिस ने किसी तरह की कार्रवाई नहीं की. पुलिस की निष्क्रियता की वजह से बाद में दो लोगों की हत्या की घटना हुई. पशु व्यवसायियों की हत्या के बाद आक्रोशित लोगों ने सड़क जाम कर विरोध किया. इस दौरान पुलिस अधिकारी रतन कुमार सिंह ने लोगों के साथ अभद्र व्यवहार किया और समुदाय विशेष के खिलाफ आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया. इसलिए सरकार इस अधिकारी के खिलाफ भी कार्रवाई करे.

रिपोर्ट में हजारीबाग की घटना का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि यहां एक समुदाय विशेष के धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाले नारे पहले से लगाये जाते रहे हैं. वर्ष 2016 में नारों के साथ-साथ धार्मिक उन्माद भड़काने वाले गाने भी बजाये जाने लगे. जुलूस में शामिल कुछ लोग शराब के नशे में धुत थे. ऐसे में धार्मिक उन्माद फैलाने वाले नारों से वे प्र‌भावित हो गये और सांप्रदायिक हिंसा की शुरुआत हुई. रिपोर्ट में कहा गया है कि अगलगी की घटना के दौरान लोगों ने पुलिस से मदद मांगी, लेकिन उन्हें मदद नहीं मिली. घटना के दिन जुलूस पर प्रशासन का नियंत्रण नहीं था. आयोग ने घटना के सिलसिले में सभी पीड़ित पक्षों को हुए नुकसान का आकलन करने और उचित मुआवजा देने की अनुशंसा की है.


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