आज से 6 वर्ष पूर्व एडवोकेट शाहिद आज़मी को उनके ऑफिस में घुस कर 2 लोगो ने शहीद कर दिया गया था …

शाहिद मुम्बई में रहने वाला एक आम मुसलमान जैसा था। 1992 दंगो के बाद पुलिस ने शाहिद को, जिसकी उम्र महज़ 16 वर्ष थी, गिरफ्तार कर लिया। जेल में मिली यातनाओं से आहात शाहिद जब बाहर निकला तो कानून हाथ में लेने का निश्चय किया और कश्मीर जाकर हथियार चलाने का प्रशिक्षण लेने का इरादा दिया।

बहुत जल्द उन्हें यह बात समझ आ गयी कि हिंसा का जवाब हिंसा से देने से शान्ति नहीं आ सकती, बल्कि इससे हिंसा और बढ़ेगी, शायद उनकी किस्मत में बन्दूक नहीं, कलम थी। जो उनको वापस मुम्बई ले आई और आतंक के कैंरप को शाहिद ने छोड़ दिया। शाहिद को मुम्बई में पुनः गिरफ्तार किया गया पर इस बार जेल में शाहिद ने “कलम चलाने” का प्रशिक्षण लिया। शाहिद ने जेल में रहकर वक़ालत की।

वक़ालत की डिग्री मिलने के बाद शाहिद अपनी सज़ा काट कर जेल से बहार निकले और इस बार उन्होंने बेगुनाहो को न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ी। बतौर वकील अपने 6 साल के कैरियर में शाहिद ने 17 बेगुनाहो को रिहा करवा दिया, जिनको आतंकी होने के इलज़ाम में धर लिया गया था। अदालत में शाहिद ने हर बार यह साबित किया कि इन लोगो को तंत्र में बैठे कुछ लोग अपनी नाकामी छुपाने के लिए फंसा रहे है। सरकारी वकील शाहिद की दलीलो और सबूतों के आगे पानी मांगते दिखे।

शाहिद लगातार हो रही गिरफ्तारियों के खिलाफ अदालत में मोर्चा खोले हुए थे यह बात उनके विरोधियो को पसंद नहीं आई। शाहिद को धमकिया मिलने लगी कि ऐसे लोगो का केस छोड़ दो जो आतंक के इलज़ाम में अंदर है। एडवोकेट शाहिद साहब ने किसी की नहीं सुनी, नतीजतन दो लोगो द्वारा उनके ऑफिस में उनको गोलियों से शहीद कर दिया गया। (hindiustad)


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