नई दिल्ली | 8 नवम्बर 2016 को जब प्रधानमंत्री मोदी ने नोट बंदी की घोषणा की तब देश दो हिस्सों में बंट गया. एक हिस्सा वो जो इस कदम को एतिहासिक बता रहा था और नोट बंदी के समर्थन में खड़ा था, जबकि दूसरा वो हिस्सा जो नोट बंदी को आजाद भारत का सबसे ख़राब फैसला बता रहा था. तब कई अर्थशास्त्रियो ने इसे बड़ी गलती करार दिया लेकिन मोदी समर्थक इसके ख़ारिज करते रहे.

उस समय कई मीडिया समूहों ने भी इसे एतिहासिक फैसला करार दिया. उन्होंने इसे भ्रष्टाचार और कालेधन पर सर्जिकल स्ट्राइक तक करार दे दिया. नोट बंदी से लोगो को हो रही परेशानियों से इतर वो मोदी सरकार का गुणगान करने में लगे रहे. यहाँ तक की लोगो के रोजगार ठप्प हो गए, कई लोग एटीएम की लाइन में लगे हुए मौत के काल में समा गए लेकिन मीडिया नोट बंदी के उन सकारत्मक पहुलुओ पर ही बात करता रहा जो न आगे हुई और जो न शायद होनी थी.

देश के सबसे बड़े अर्थ्शास्तियो में से एक डॉ मनमोहन सिंह ने उस समय संसद में खड़े होकर कहा था की मोदी सरकार का यह कदम देश की अर्थव्यवस्था के लिए घातक साबित होगा. उन्होंने भविष्यवाणी करते हुए कहा था की इससे देश की जीडीपी में दो फीसदी तक की गिरावट आ सकती है. यही नही मनमोहन सिंह ने इस कदम को संगठित लूट व् क़ानूनी डाका तक करार दिया था. तब बीजेपी की और से मनमोहन सिंह का मजाक उड़ाया गया.

लेकिन अब यह बात स्पष्ट है की नोट बंदी फेल हो चुकी है. यही नही इस कदम के देश के ऊपर कई विपरीत प्रभाव भी पड़े है. देश की जीडीपी धडाम हो चुकी है. ताजे आंकड़े बताते है की जून में खत्म हुई तिमाही में जीडीपी 5.7 फीसदी पर आ गयी. जो पिछले साल 7.2 फीसदी पर थी. रिपोर्ट आने के बाद हँसने की बारी मनमोहन सिंह की थी. वो जानते थे की उनकी भविष्यवाणी सच होनी है. लेकिन सत्ता के अहम् में डूबी सरकार देश के सबसे बड़े अर्थशास्त्री में से एक मनमोहन का मजाक बनाने में ही व्यस्त रही.

उस समय वित् मंत्री अरुण जेटली ने कहा था की नोट बंदी के तात्कालिक नही दूरगामी परिणाम अच्छे रहेंगे. इस पर मनमोहन सिंह ने तंज कसते हुए कहा था की जो लोग कहते हैं कि इस कदम से शॉर्ट टर्म में नुकसान और लॉन्ग टर्म में फायदा होगा उन्हें जॉन कींस की बात याद करनी चाहिए जो कहते थे….लंबे समय तक हम सब मर जाएंगे.


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