मुद्दा भारत माता की जय का : मुस्लिम उलेमाओं की राय, कोई खास नारा ही वतन परस्ती का प्रमाण नहीं

नई दिल्ली: आल इंडिया इत्तेहादे मुस्लमीन के सांसद असदुद्दीन ओवैसी के भारत माता की जय कहने से इनकार संबंधी बयान के बाद देशप्रेम और भारत माता की जयकार को लेकर बहस छिड़ गई है। भारत माता की जय का नारा लगाने के पक्ष और विपक्ष में न सिर्फ अलग-अलग तर्क दिए जा रहे हैं बल्कि इसे लेकर राष्ट्रवादी होने या न होने पर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं। NDTV इंडिया ने इस बारे में देश के चुने हुए इस्लामी धर्मगुरुओं की राय जानने की कोशिश की तो सभी का मत है कि इस्लाम में राष्ट्रप्रेम की सीख दी गई है लेकिन ईश्वर के रूप में सिर्फ खुदा की ही इबादत होती है। भारत माता को देवी के रूप में पूजना धर्म के खिलाफ है। उनका कहना है कि सियासत के लिए इस मुद्दे को हवा दी जा रही है।

ओवैसी ने सियासत चमकाने के लिए मुद्दा बनाया
दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी का कहना है कि ‘भारत माता की जय,  बहस का मुद्दा था ही नहीं, इसको मुद्दा असदउद्दीन ओवैसी ने बनाया है। मोहन भागवत ने मुसलमानों से भारत माता की जय बोलने के लिए थोड़े ही बोला था, उन्होंने राष्ट्र से कहा था। ओवैसी ने सियासत चमकाने के लिए इसको मुद्दा बनाया। उनके इन नारों से एक बस्ती में सिर्फ 50 मुसलमानों के घर पर क्या असर होता होगा, उनको अहसास नहीं होगा।’ उन्होंने कहा कि ‘खास नारा लगाने से वतन परस्ती साबित नहीं होती। आजादी के बाद से मुसलमानों को पिछड़ा बनाए रखने की साजिश की जा रही है। असल मुद्दों से भटकाने के लिए इस तरह का मुद्दा छोड़ा जाता है। सभी मुसलमानों को सोच समझकर कदम उठाने की ज़रूरत है।’

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मुसलमान भी मादर ए वतन ज़िंदाबाद का नारा लगाते हैं
जमीयत उलेमा ए हिन्द के अध्यक्ष मौलाना सैयद अरशद मदनी ने कहा कि ‘भारत माता की जय का उर्दू अनुवाद मादर ए वतन ज़िंदाबाद किया गया है। मुसलमान भी मादर ए वतन ज़िंदाबाद और हिंदुस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाते हैं। इसमें कोई हर्ज नहीं, लेकिन अगर कुछ लोग दिल में कुछ और रखते है या उसे माबूद (खुदा) समझकर पूजा की बात करते हैं तो यह जायज़ नहीं है। यह उनका अपना मामला है।’

जानबूझकर चलाई जा रही बहस
जमात ए इस्लामी हिन्द के राष्ट्रीय महासचिव सलीम इंजीनियर का मत है कि ‘देश में यह बहस इस वक्त जानबूझकर चलाई जा रही है। भारत माता की जय, जो अपनी पसंद से बोलना चाहे जरूर बोले, मगर सब पर जबरदस्ती थोपने की कोशिश करना साफ तौर पर फासिस्ट मानसिकता है। इससे समाज और देश में अविश्वास और दूरियां बढ़ेंगी। मुसलमान ईश्वर के अलावा किसी को पूज्य नहीं मानता। आरएसएस भारत माता की तस्वीर रखता है, उसकी पूजा भी करता है। भारत माता को देवी के रूप में मानता है। वह जरूर मानें, उन्हें पूरा अधिकार है मगर वह भारत के बहुलतावादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक ढांचे को नुकसान न पहुचाए।’

कोई देवी नहीं, माता के रूप में मातृ भूमि जायज
दिल्ली के चांदनी चौक की फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम डॉक्टर मुफ़्ती एम मुकर्रम अहमद ने कहा कि ‘अगर इस तरह ज़बरदस्ती नारे लगवाने पर पाबन्दी नहीं लगाई गई तो अल्पसंख्यक मुसलमानों में असंतोष बढ़ेगा। नारे लगाने पर मजबूर करना या नारे न लगाने पर देशद्रोही का इल्ज़ाम लगाना सरासर गलत है। किसी को भी आपस में नारे लगाने या न लगाने पर बहस नहीं करनी चाहिए। इससे देश में बदअमनी फैलती है। जय हिन्द , हिंदुस्तान, भारत महान सब एक बराबर हैं। अगर माता शब्द से मुराद देवी देवता से है तो इस्लाम में जायज़ नहीं है। अगर यही माता शब्द मातृ भूमि से है तो जायज़ है। इस माहौल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इस्लाम मज़हब के बारे में  दिया गया वक्तव्य काबिल ए तारीफ है। उनकी पार्टी के लोगों को उनकी इस बात से सीख लेनी चाहिए।’

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किसी के कहने पर न लगाएं नारा
लखनऊ की ईदगाह के मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली का मत है कि ‘मुसलमानों को कतई ज़रूरत नहीं है कि वे किसी के कहने पर नारा लगाएं। सबसे बड़ा मज़ाक यही है कि आरएसएस ने देश की आज़ादी में ज़र्रा बराबर पसीना नहीं बहाया, वह मुसलमानों से वतन परस्ती की बात करते हैं। इस्लाम मज़हब की तालीम है कि अपने मुल्क के साथ पूरी तरह मोहब्बत करो और वफादारी निभाओ। यही वजह है कि मुसलमान अपनी सभी संस्थाओं, मदरसों में  26 जनवरी और 15 अगस्त को तिरंगा भी लहराते हैं और जय जयकार करते नहीं थकते। भारत माता की जय को लेकर बहस पूरी तरह से सियासी है।’

शरियत के मुताबिक कोई परेशानी नहीं
इत्तेहाद ए मिल्लत कौंसिल के अध्यक्ष मौलाना तौक़ीर रज़ा खान की कहना है कि ‘जो मुसलमान अपने वतन से मोहब्बत नहीं करता, वह सच्चा और पक्का मुसलमान नहीं हो सकता। मुसलमान हमेशा जय हिन्द और हिंदुस्तान ज़िंदाबाद कहता रहा है। मादरे वतन से मोहब्बत का इज़हार करता रहा है। किसी के दबाव में नहीं अपने मज़हब के हुकुम पर हम अपने वतन से मोहब्बत करते हैं। हमसे ज़बरदस्ती यह काम नहीं कराया जा सकता। रहा सवाल भारत माता की जय का, तो मुझे भारत माता की जय में कोई शरई कबाहत (शरियत के मुताबिक परेशानी) महसूस नहीं होती है। आरएसएस और ओवैसी साहब के इस खेल में हिन्दू और मुसलमानों में नफरत का बाजार गरम हो रहा है जो हमारे मुल्क के लिए सख्त नुकसानदेह है।’

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मुल्क को रूह का दर्जा, हमें मुल्क पर नाज
इमाम कौंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मौलाना मक़सूद उल हसन क़ासमी ने कहा कि ‘सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा, इक़बाल की देन है, जिसको हर हिन्दुस्तानी फ़ख़्र के साथ गाता है। जहां तक भारत माता की जय का सवाल है, भारत माता शब्द अल्लाह के अलावा मातृ भूमि की पूजा की तरफ ले जाता है जो इस्लाम के एक अल्लाह के सिद्धांत के खिलाफ है। हम जय हिन्द, हिंदुस्तान ज़िंदाबाद कहना पसंद करते हैं। मुल्क को हम रूह का दर्जा देते हैं। हमें अपने मुल्क पर नाज़ है। इस्लाम में जमीन की पूजा नहीं है अल्लाह की पूजा है, इसलिए हम भारत माता नहीं कह सकते।’

जय और जिंदाबाद, जिसे जो बोलना, बोले
शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे रुशैद रिज़वी का मत है कि ‘राष्ट्रीय गीत पर जैसे हिंदुस्तान खड़ा होता है वैसे ही मुसलमान खड़ा होता है। जय और  ज़िंदाबाद दोनों मुल्क के लिए हैं, जिसे जो बोलना है बोले। आज़ाद  हिंदुस्तान में यह मजबूरी नहीं है। ऐसी बहसें मुल्क की तरक्की को पटरी से उतार सकती हैं।’ (NDTV)


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