सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक को लेकर चल रही सुनवाई के दौरान आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि इस्लाम ने महिलाओं को भी पति को तीन तलाक कहने का हक दिया हुआ है.

बोर्ड ने कहा कि मुस्लिम समुदाय में शादी एक समझौता है. बोर्ड ने इस बात पर जोर दिया कि महिलाओं के हितों और उनकी गरिमा की रक्षा के लिए इस्लाम के तहत निकाहनामे में कुछ खास इंतजाम करने का विकल्प खुला हुआ है. बोर्ड ने कहा कि महिला निकाहनामे में अपनी तरफ से कुछ शर्तें भी रख सकती है.

निकाह से पहले अपनी गरिमा की रक्षा के लिए तलाक की सूरत में मेहर की बहुत ऊंची राशि मांगने जैसी शर्तों को शामिल करने जैसे दूसरे विकल्प भी उसके पास उपलब्ध हैं. सुनवाई के दौरान पर्सनल लॉ बोर्ड के दस्तावेजों से पढ़कर मुख्य न्यायाधीश जे.एस. खेहर ने पूछा कि पैगंबर मोहम्मद के साथी अबूबकर ने कहा है कि तीन तलाक को एक ही तलाक माना जाए. आप कह रहे हैं कि अहले हदीस और शरीया पैगंबर के साथियों ने बनाई है तो फिर अबूबकर तीन तलाक को एक ही तलाक क्यों मान रहे हैं.

इस पर सिब्बल ने कहा कि यह अलग-अलग विद्वानों की व्याख्या है, लेकिन तीन तलाक को अहले हदीस में पूरी मान्यता है. उन्होंने आगे कहा, तीन तलाक आस्था का मामला है जिसका मुस्लिम बीते 1400 वर्ष से पालन करते आ रहे हैं। इसलिए इस मामले में संवैधानिक नैतिकता और समानता का सवाल नहीं उठता है.


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