श्रीनगर | आज से ठीक एक साल पहले, दक्षिणी कश्मीर के शोपियां में सुरक्षाबलो ने आतंकी बुरहान वाणी को एक मुठभेड़ में मार गिराया. बुरहान की मौत के बाद घाटी में हिंसा शुरू हो गयी जो करीब एक महीने तक जारी रही. पूरी घाटी में कर्फ्यू लगाया गया, स्कूल कॉलेज बंद रहे, इन्टरनेट पर रोक लगा दी गयी. इतना सब करने के बाद भी जब हिंसा नही रुकी तो सुरक्षाबलो को पैलेट गन का सहारा लेना पड़ा.

पैलेट गन , एक ऐसा हथियार है जो प्रदर्शनकारियो को नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल होता है. इसमें गोलिया की जगह छर्रों का इस्तेमाल होता है. इसलिए इस गन के इस्तेमाल से लोगो की जान नही जाती लेकिन उसे पूरी जिन्दगी इन छर्रों के साथ जीना पड़ता है. उस समय ऐसे बहुत से लोग थे जो प्रदर्शन में शामिल नही होने के बावजूद इन पैलेट गन का शिकार बने. किसी की आँखे चले गयी तो किसी का पूरा शरीर छर्रों से चलनी हो गया.

अपनी आँखे गवाने वालो में इंशा मुस्ताक लोन भी शामिल थी. एक साल पहले ही इंशा और आज की इंशा में यह फर्क है की अब उसकी आँखे रुई से ढकी रहती है और बाकी बाकी चेहरा पैलेट गन के निशानों से दागदार है. 15 वर्षीय इंशा का सपना एक फ़ास्ट बॉलर बनने का था. जैसे ही क्रिकेट का जिक्र होता है तो उनके चेहरे पर रौनक आ जाती है. लेकिन कुछ ही देर में वो कही खो जाती है. वो शायद ही अब कभी अपना पसंदीदा खेल खेल पाए.

पैलेट का शिकार होने वाली घटना को याद करते हुए इंशा बताती है की वो उस दिन अपने गाँव सेदाव में थी. 11 जुलाई की वो तारीख जब मैं अपने घर पर बैठी हुई पढ़ रही थी. इस दौरान वहां मेरी मां, आंटी और कजन भी थी. बीच बीच में हम बात भी कर रहे थे. इसी दौरान वहां हिंसा भड़क उठी. शोर कम होने पर जैसे ही मैंने घर की खिड़की खोली तो मैं पैलेट गन का शिकार बन गयी.

फ़िलहाल इंशा की करीब छह सर्जरी हो चुकी है. लेकिन उसकी आँखों को बचाया नही जा सका. इंशा का चेहरा , पैलेट से इनती बुरी तरह चलनी हो चूका है की उसकी एक्सरे रिपोर्ट देखकर किसी का भी दिल बैठ जाए. चेहरे , गले, जबड़े, ऐसी कोई जगह नही है जहाँ पैलेट न घुसी हुई हो. लेकिन इन सबके बावजूद इंशा के अन्दर एक उम्मीद है की एक दिन वो देख पायेगी. उसके परिवार वालो का कहना है की वो इंशा की आँखों के लिए अपना सब कुछ बेचने के लिए भी तैयार है.


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