नई दिल्ली: सरकार का कहना है कि मदुरै स्थित अनजाना-सा निजी कॉलेज त्यागराजर स्कूल ऑफ मैनेजमेंट देश के बिज़नेस स्कूलों में 15वां सर्वश्रेष्ठ संस्थान है। स्कूल की वेबसाइट का कहना है कि उसके यहां से डिग्री पाने वाले औसतन पांच लाख रुपये वार्षिक वेतन की नौकरियां पाते हैं, जबकि एमबीए की डिग्री रखने वालों को आमतौर पर इससे कहीं ज़्यादा वेतन मिल जाया करता है।

विशेषज्ञों की नज़र में 'फेल' हो गईं सरकार की कॉलेज रैंकिंगवर्ष 2011 में पाठ्यक्रम शुरू करने वाले आईआईएम उदयपुर के पास अपना कैम्पस तक नहीं है, और किसी अन्य यूनिवर्सिटी में किराये पर कमरे लेकर क्लास आयोजित करने वाला यह संस्थान सरकार की रैंकिंग के अनुसार पांचवें स्थान पर है, जबकि आईआईएम इंदौर को इससे पीछे रखा गया है।

ये कुछ मुद्दे हैं, जिनके आधार पर विशेषज्ञ सरकार द्वारा भारतीय कॉलेजों को पहली बार दी गई रैंकिंग की धज्जियां बिखेर रहे हैं। सरकार के मुताबिक, रैंकिंग का उद्देश्य विद्यार्थियों को कॉलेज का चयन करने में मदद देना था।

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इसी सप्ताह के शुरू में जारी की गई रिपोर्ट का कहना है कि आईआईटी मद्रास देश का सर्वश्रेष्ठ इंजीनियरिंग कॉलेज है, जबकि आईआईएम बंगलौर सर्वश्रेष्ठ मैनेजमेंट कॉलेज। इसके अलावा सरकार ने हाल ही में विद्यार्थी संघर्ष का गवाह बनीं जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी तथा हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी को भी शानदार रेटिंग दी है।

लेकिन शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार की रैंकिंग तर्क की कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं।

कई साल तक बिज़नेसवर्ल्ड, आउटलुक जैसे प्रकाशनों के लिए यूनिवर्सिटी रैंकिंग का डेटा इकट्ठे करते रहे संगठन C Fore के मुख्य कार्यकारी प्रेमचंद पालेटी ने कहा, “यह मज़ाक है… आईआईएम इंदौर और आईआईएम कोझीकोड, दोनों के पास 100 एकड़ के कैम्पस हैं, सो, उन्हें उदयपुर से नीचे कैसे रखा जा सकता है…?” गौरतलब है कि सरकार ने भी बिज़नेस स्कूलों का आकलन करने के लिए C Fore से विचार-विमर्श किया था।

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आईआईएम उदयपुर के निदेशक जन्नत शाह किसी भी तरह की तुलना करने से बचते रहे, लेकिन उन्होंने कॉलेज को दिए गए रैंक का बचाव किया, “हमने शुरू से ही शोध पर फोकस किया, और इसीलिए हमें लाभ मिला…” उधर, पालेटी इस तर्क से सहमत नहीं हैं, और कहते हैं कि आईआईएम उदयपुर उन संस्थानों में शुार नहीं किया जाता, जो बड़े पैमाने पर शोध के लिए जाने जाते हैं।

इन रेटिंग के लिए 3,500 सरकारी और निजी यूनिवर्सिटी को रैंकिंग दी गई, और इसके लिए विद्यार्थियों तथा अध्यापकों के अनुपात तथा सीखने के साधनों जैसे पैरामीटरों को भी शामिल किया गया।

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रेटिंग को संभालने वाली सरकारी एजेंसी के प्रमुख डॉ सुरेंद्र प्रसाद का कहना है कि चूंकि यह पहली बार था, हम मानते हैं, कमियां रही हैं… NDTV से बात करते हुए डॉ प्रसाद ने कहा, “नए संस्थानों को अनचाहा लाभ मिल जाता है, और हमें देखना होगा कि यह कैसे ठीक हो… दरअसल, नए संस्थानों में विद्यार्थी कम होते हैं, सो, विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात बेहतर होता है…”

बहरहाल, डॉ प्रसाद के मुताबिक, कुछ जाने-माने संस्थान रैंकिंग इसलिए नहीं पा सके, क्योंकि उन्होंने आवश्यक जानकारी ही उपलब्ध नहीं करवाई, जबकि विशेषज्ञों के अनुसार, यह तर्क फैकल्टी ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज़ पर लागू नहीं होता, जो सरकार द्वारा ही संचालित है, और जिससे जुड़ी सभी जानकारी तक अधिकारियों की पहुंच है। (khabar.ndtv.com)


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