देश में चुनावों के ऐलान के साथ ही हर दल ये जताने की कोशिश करता है कि भारत की राजनीति में मुस्लिम समुदाय ही किंगमेकर है. इसकी वजह के पीछे तर्क दिया जाता है कि मुस्लिमों के थोक वोट किसी भी दल को जिताने और हराने की साहिलियत रखते है. हालांकि ये एक बार फिर से मिथक साबित हुआ.

लोकसभा चुनाव सहित विभिन्न राज्यों में हुए चुनावों में बीजेपी बिना मुस्लिम वोट के सत्ता पाने में कामयाब रही और अब बिहार में बीजेपी एक बार फिर यह साबित करने में कामयाब रही है कि मुस्लिम वोटर अब न तो उसकी चुनावी राजनीति में आड़े आते हैं और न ही दूसरें दलों के साथ दोस्ती में बाधा बनते हैं.

2015 के बिहार चुनाव में नीतीश और लालू, कथित ‘सांप्रदायिक’ ताकतों से लड़ने के नाम पर ही साथ आए थे, लेकिन जिस तरह से नीतीश ने लालू को झटका देकर बीजेपी से हाथ मिलाया, उससे यह साफ हो गया कि बीजेपी की मुस्लिम वोटरों की ‘परवाह न करने’ की रणनीति को नीतीश ने भी सही मान लिया है. नीतीश ने इस बात की जरा भी परवाह नहीं की कि 2015 के चुनाव में उन्हें मुस्लिम वोटरों का भी भरपूर साथ मिला था.

हालांकि इससे पहले यूपी के चुनाव में बीजेपी ने एक भी मुस्लिम प्रत्याशी को मैदान में नहीं उतारा बावजूद ध्रुवीकरण के जरिए बीजेपी सत्ता हासिल करने में कामयाब रही, इस दौरान बीएसपी और एसपी के बीच मुस्लिम मतों का केवल बंटवारा हुआ. असम में भी बीजेपी ने कांग्रेस द्वारा अल्पसंख्यक कट्टरता के प्रति कांग्रेस के नरमी उसे भारी पड़ी और तरुण गोगोई सरकार को सत्ता से बेदखल होना पड़ा.


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