नई दिल्ली। अब इसे हमारी खुशकिस्मती कहें या फिर तेल उत्पादक देशों की अमेरिका के साथ चल रही अदावत, लेकिन हकीकत ये है कि आज की तारीख में कच्चा तेल पानी के भाव से बिक रहा है। चौंकिए नहीं ये हकीकत है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दामों की हालत ये है कि पिछले एक साल में 70 फीसदी की गिरावट आ गई है, लेकिन हमारे देश में इसका फायदा आम जनता को नहीं मिल रहा है।

इसकी जगह सरकार जमकर मुनाफा कमा रही है और तेल कंपनियां भी मालामाल हो गई हैं। देश की जनता आज भी 60 रुपये से अधिक की कीमतों पर तेल खरीदने को मजबूर है। आप सोच रहे होंगे कि आखिर पानी से सस्ता तेल कैसे हो गया? तो आइए आपको ये गणित समझा भी देते हैं।

दरअसल, इस समय WTI क्रूड 31 डॉलर और ब्रेंट क्रूड 31.40 डॉलर प्रति बैरल के बिक रहा है। तेलों में गिरावट का 2004 के बाद का ये सबसे निचला स्तर है। भारतीय बास्केट में इसकी कीमत को आंका जाए एक बैरल की यानी तकरीबन 159 लीटर तेल की कीमत 2001.28 रुपये होती है यानि एक लीटर क्रूड ऑयल की कीमत तकरीबन 12.58 रुपये बैठती है जबकि इस देश में मिनरल वाटर 15 से 20 रुपये में बिकता है।

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दरअसल, इस तेल के खेल में देश की जनता भले ही ऊंची कीमतों से परेशान हो रही है, लेकिन के कच्चे दामों में आई इस भारी गिरावट का असली फायदा सरकार और तेल कंपनियां उठाती हैं। इस समय हकीकत ये है कि फायदे की असल चांदी सरकार और तेल कंपनियां काट रही हैं। जो तेल जनता को आधी कीमत में मिलना चाहिए था उसे दोगुनी कीमत पर बेचा जा रही है सिर्फ दिल्ली को ही देखा जाए तो यहां पर पेट्रोल की कीमत तकरीबन 60 रुपये 48 पैसे है। ऐसे होती है इसमें सरकारों की सबसे ज्यादा कमाई कैसे होती है?

तेल कंपनियों को प्रोसेस के बाद एक लीटर पेट्रोल की कीमत तकरीबन 23.77 रुपये पड़ती है, जिसे कंपनियां डीलरों को 27.6 रुपये पैसे की दर से डीलरों को बेचती हैं और डीलर इसमें 2 रुपये 26 पैसे अपना मुनाफा जोड़ते हैं, लेकिन असल खेल यहां से होता है जब केंद्र सरकार इस एक लीटर पर 19 रुपये 6 पैसे एक्साइज टैक्स वसूलती हैं और उसके बाद राज्य सरकार वैट के जरिए तकरीबन 12 रुपये 10 पैसे की वसूली करती है यानी जो पेट्रोल महज 25 से 30 रुपये प्रति लीटर मिलना चाहिए वो तकरीबन दो गुने दाम पर बेचा जाता है।

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हमारे देश में तेल के दामों को लेकर हमेशा से ही सियासत होती रही है। एक वक्त था जब सरकारें तेल कंपनियों को सब्सिडी देती थी और वोट बैंक के चलते तेल की कीमतें तय होती थीं, लेकिन पिछली सरकारों ने ये कहते हुए दाम तय करने का हक तेल कंपनियों को दे दिया कि कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार के आधार पर तय होती हैं, लेकिन हकीकत ये है कि आज भी सरकारों की बिना इजाजत के तेल कंपनियों में पत्ता तक नहीं हिलता।

यही कारण है कि पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान पेट्रोल डीजल की कीमतें भी एक मुद्दा थीं और आज भी जब तेल की कीमतें निचले स्तर पर हैं तो सियासत जारी है। वहीं सरकार जो सत्ता में आने से पहले तेल के दाम कम करने की बात करती थी। आज मुकर रही है और विपक्ष आरोप लगा रहा है।

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पिछले दिनों जब तेल के दामों में गिरावट आई थी तो महज एक महीने के भीतर सरकार ने दो बार एक्साइज ड्यूटी बढ़ाकर अपना मुनाफा बढ़ा लिया। ये अलग बात है कि पेट्रोल डीजल के दाम कम न करने को लेकर सरकार अलग-अलग तर्क दे रही हैं और सरकार के समर्थक ये कहते हैं कि सरकार को जनहित योजनाओं के लिए धन चाहिए।

लिहाजा उसके लिए इस तरह की नीति अपनाना मजबूरी है, लेकिन इसके साथ ही सवाल ये भी है कि फिर सियासी दल ये दावा क्यों करते हैं कि तेल के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार के आधार पर तय होते हैं? और आखिर जनता को अच्छे दिनों के लिए अभी और कितना इंतजार करना होगा? साभार: ibnlive


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