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कविता कृष्णन का लेख का हिंदी अनुवाद 

भारत जहाँ विभिन्न प्रथाओ और समुदाय के नागरिक जीवन व्यापन करते हैं. हिन्दू, मुस्लमान, सिख, ईसाई, आदि जितने भी धर्म के लोग यहाँ रहते हैं सभी अपने धार्मिक त्योहारो को बड़ी ही स्वतंत्र के साथ मनाते हैं. लेकिन वास्तव में देखा जाये तो क्या यह सच हैं, तो जवाब यह आएगा ‘नहीं. यदि हम इस वर्ष ईद-उल-अज़हा या बकरीद की बात करे, जो मुसलमानो का एक महत्वपूर्ण पर्व हैं जिसमे मुस्लमान जानवरो की क़ुरबानी अल्लाह की राह में करते हैं. लेकिन दुसरे समुदाय के लोग इसको मुद्दा बनाते हैं और जानवरो के अधिकारों की बात करते हैं.

ऐसा ही कुछ भारतीय मीडिया ने भी किया, मामला बांग्लादेश की राजधानी ढाका का हैं जहाँ वाटर लॉगिंग के कारण सड़को पर जल भराव हो गया जिसकी तस्वीरो को भारतीय मीडिया ने फोटोशॉप कर उसको ‘खून की नदियों’ में तब्दील कर दिए, परंतु जब अस्ल तस्वीर सामने आयी तो सभी के चहरे के रंग बदल गए.

इस सम्बन्ध में भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन की सचिव कविता कृष्णा ने अपने फेसबुक पेज पर भी इस मुद्दे की चर्चा की. उन्होंने कहा कि ईद क़ुरबानी और पशुओ के अधिकारों के नाम पर चल रहे अभियान को लेकर मैं बहुत परेशान हूँ, और इस मामले पर मैं यह कहना चाहूंगी कि यहाँ पर गैर मानव जानवरों के साथ मानवीय रिश्तों की नैतिकता पर चिंता व्यक्त की जा रही हैं.

जब मैंने देखा कि बांग्लादेश की ईद की “खून की नदी” की तस्वीरो को दिखाया जा रहा हैं और सोशल मीडिया पर पशु अधिकार का मुद्दा बनाकर खुल धर्म निरपेक्षी खुल कर इसको प्रचारित कर रहे हैं, परंतु जब मैंने इन तस्वीरो पर गौर किया तब मुझको ऐसा लगा कि ज़रूर इन तस्वीरो में कुछ गलत हैं.

पहली महत्वपूर्ण बात खून की नदी की तस्वीरे, तो ढाका की खबरों के मुताबिक, बाढ़ के कारण वाटर लॉगिंग और उचित व्यवस्था न होने के कारण पानी सड़को पर जमा होना लेकिंन इसी खबर को भारतीय मीडिया ने क़ुरबानी के कारण खून की नदी में परिवर्तित कर दिया, और इस खबर को पूरी तरह से मॉडिफाइड कर फोटोशॉप की सहायता से पशु अधिकार के मुद्दे पर मुसलमानो को घेर यह साबित करना चाहा कि इस्लाम में निर्दयता हैं.

हम मानवजाति जिसमे शाकाहारी वर्ग के लोग भी शामिल हैं, हमेशा जानवरो के प्रति क्रूरता और उनके खिलाफ हो रही हिंसा के मुद्दे पर फंसे रहते हैं. यदि हम डेरी उद्योग की बात करे तो वह मवेशियो पर एक भारी दंड हैं इसी तरह पोल्ट्री उद्योग फिर चाहे वह अंडे या चिकन के उत्पादन हो, जिसमे अधिक क्रूरता और पीड़ा शामिल हैं. और आप संयंत्र आधारित खाद्य के कृषि उत्पादन के बारे में क्या कहेगे? इस प्रक्रिया में लाखो जानवर मारे जाते हैं.

तो क्या हम लोग पशु चिन्ता करना चोर दे, नहीं. लेकिन हमको ज़रुरत हैं कि हम किसी मुद्दे पर चर्चा के दौरान किसी दुसरे धर्म की भावनाओ को आहात न करे.

आइये आपको दिखाते हैं कि किस तरह सीएनएन और इंडिया टुडे ने फोटोशॉप तस्वीरो के ज़रिये इस्लाम की छवि को धूमिल करने की कोशिश की. और उन तस्वीरो को भी दिखाते हैं जिनको पेश कर भारतीय मीडिया यह साबित करना छह रही थी कि यह खून की नदी हैं.

इस लिंक के ज़रिये आप उनके फेसबुक पोस्ट तक पहुँच सकते हैं. 


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