एक आरटीआई से यह बात सामने आई है कि सरकारी बैंक मुस्लिमों को प्रायरिटी सेक्टर के लोन देने में काफी फिसड्डी रहे हैं। मुंबई के आरटीआई कार्यकर्ता एमए खालिद ने पब्लिक सेक्टर के आधा दर्जन बैंकों से आरटीआई के जरिए ये जानकारी हासिल की है। जानकारी के मुताबिक, करीब आधा दर्जन बैंकों ने पिछले डेढ़ सालों में सभी प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों में मिलने वाले कर्ज का महज 2 प्रतिशत ही मुस्लिमों को मिल सका है। ये आंकड़े वित्त वर्ष 2014-15 और 2015 मार्च से 30 सितंबर, 2015 तक के हैं।

muslimwomen-17-1455718336 हालांकि, मुस्लिमों को लोन देने को लेकर कोई दिशा-निर्देश नहीं है, लेकिन बैंंक मानते हैं कि दिए जाने वाले कर्ज का 15% अल्पसंख्यकों को देना होता है। भारत की कुल जनसंख्या में मुस्लिमों की तादाद 14.2 प्रतिशत (2011 की जनगणना के हिसाब से) है। समुदाय के प्रतिनिधियों का मानना है कि बैंकों से मिलने वाले कर्ज में बढ़ोतरी होनी चाहिए।

आरटीआई से मिली जानकारी में खालिद ने पाया कि पंजाब ऐंड सिंध बैंक, इलाहाबाद बैंक, कॉर्पोरेशन बैंक, बैंक ऑफ महाराष्ट्र, विजया बैंक और आंध्र बैंक में से केवल इलाहाबाद बैंक में ही मुस्लिमों को कर्ज देने की दर में बढ़ोतरी हुई है। यहां 31 मार्च, 2015 को मुस्लिमों को दिए जाने वाले कर्ज की दर 7.07 % थी, जो इस साल सितंबर तक 7.19 प्रतिशत हो गई। कॉर्पोरेशन बैंक इस मामले में सबसे पीछे है। यहां 31 मार्च, 2015 तक मुस्लिमों को मिलने वाले कर्ज की दर केवल 1.90 प्रतिशत थी जो सितंबर के अंत में केवल 1.95 प्रतिशत तक पहुंची।

खालिद का कहना है, ‘डेटा साफ बताता है कि इस क्षेत्र में कर्ज के रूप में मुस्लिमों को मिलने वाले शेयर में सुधार की कोशिशें नहीं की गईं। यह पीएम नरेंद्र मोदी के ‘सबका साथ सबका विकास’ का खोखलापन बताता है।’ इस बारे में हमारे सहयोगी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया ने पंजाब ऐंड सिंध बैंक, इलाहाबाद बैंक, बैंक ऑफ महाराष्ट्र (बीओएम) और आंध्र बैंक से स्पष्टीकरण के लिए संपर्क किया था। लेकिन किसी ने भी जवाब नहीं दिया। हालांकि बीओएम के एक अधिकारी ने फोन पर बताया, ‘हम और ब्रांच खोल कर मुस्लिमों तक पहुंच रहे हैं।’

टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस के उपनिदेशक डॉ. अब्दुल शबान ने कहा, ‘कुछ साल पहले किए गए एक सर्वे में पाया गया कि मुस्लिमों की आर्थिक स्थिति उनके इलाकों में बैंकों की उपस्थिति नहीं होने की मुख्य वजहों में से एक है।’ सच्चर कमिटी की रिपोर्ट में यह देखा गया कि मुस्लिम केंद्रित इलाकों को कुछ बैंकों द्वारा ‘नेगेटिव’ या ‘रेड’ जोन में रखा गया था। पैनल ने पाया कि चूंकि कई मुस्लिमों का खुद का रोजगार है, लिहाजा कर्ज में बढ़ोतरी उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में मदद करेगी। (NBT)


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