नई दिल्ली : 17 और 18 मार्च को दिल्ली में होने वाले सूफ़ी कांफ्रेंस का आज प्रधानमत्री मोदी ने उद्घाटन किया। इस समारोह में दुनिया भर के 20 देशों के लगभग 200 मशहूर सूफी विद्वान भाग ले रहे हैं। इस सम्मलेन को ऑल इंडिया उलेमा एंड मशरिक कर रहा है। मोदी के इस समारोह में शामिल होने के बाद कई जानकर इसे एक बड़ी धार्मिक कूटनीतिक साजिश बता रहे हैं। जिसमे मुसलमाओं के बीच सेंध लगाकर उनका समर्थन प्राप्त किया जा रहा है।
जानकारों की माने तो इस बोर्ड को चलाने वाले ज्यादातर मुसलमान बरेलवी सम्प्रदाय से जुड़े हुए हैं। बरेलवी सम्प्रदाय का हमेशा से राजनीति में ज्यादा बर्चस्व नही रहा इसलिए देवबंद के मुसलामानों की तरह ये ज्यादा संगठित नही रह सके। इस सम्प्रदाय में ज्यादातर गरीबी और अशिक्षा से जूझ रहे हैं।
देवबंदियों और बरेलवी सम्प्रदाय में मस्जिदों को लेकर आपसी प्रतिस्पर्धा है देवबंदियों के पास ज्यादा राजनीतिक ताकत होने के कारण ये बरेलवी सम्प्रदाय से आगे निकल गए। यही कारण है कि इस सम्प्रदाय का एक हिस्सा बीजेपी सरकार के समर्थन में खड़ा दिखाई देता है।
बीबीसी हिंदी की खबर के अनुसार जैसे ही दिल्ली में होने वाले सूफी सम्मलेन में मोदी के शामिल होने की बात सामने आयी भारतीय मुस्लिम समुदाय के नेताओं ने 11 फ़रवरी को प्रेस कांफ्रेंस कर भारतीय मुसलमानों को चेतावनी दी कि उन्हें आपस में लड़ाने की कोशिश की जा रही है। उनका आरोप है कि इसके लिए सरकार फंड भी मुहैया करवा रही है। सूफी कांफ्रेंस के आयोजकों ने माना भी कि सरकार इसके लिए सहायता कर रही है।
महाराष्ट्र के ऑल इंडिया सुन्नी जमीयत उलेमा और रज़ा एकेडमी समेत कई संगठनों की ओर से जारी बयान में कहा गया कि इस ‘सूफ़ी कॉन्फ्रेंस’ को उन कुछ ताक़तों का समर्थन हासिल है, जो भारतीय मुस्लिमों को ‘संप्रदाय’ और ‘विश्वास’ के आधार पर बांटना चाहते हैं।
कई सूफी जानकारों का मानना है कि आने वाले विधानसभा चुनावों के लिए बीजेपी अब हिन्दुवों के विभाजन से आगे मुस्लिमों का भी विभाजन कर लाभ उठाना चाहती हुई। इस रणनीति के तहत दूसरे मुसलमानों को चरमपंथ समर्थक के रूप में बताकर बरेलवी संप्रदाय के बीच कुछ मतदाताओं को अपनी ओर खींच सकती है।  (indiasamvad)

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