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वे कहते हैं ‘मेरा देश आगे बढ़ रहा है’ और मुझे ‘मेरा देश गड्ढे में गिर रहा है’ सुनाई देता है। देश गड्ढे में इसलिए गिर रहा है कि यूजीसी के बजट में 55 प्रतिशत कटौती कर दी गई है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति को तो पुरानी हवेली का ख़ज़ाना बना दिया गया जिसके बारे में या तो ज़मींदार को मालूम होता था या हवेली के दरबान को। एक सरकारी अधिकारी को इस नीति से जुड़े अपने ही सुझावों को जनता से साझा करने के लिए सरकार को धमकी देनी पड़ी।

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पिछली बार राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में बनी थी, यानी आज से 30 साल पहले। जिस देश की आबादी में 65 प्रतिशत हिस्सा 35 साल तक की उम्र के युवाओं का हो, वहाँ गुपचुप ढंग से राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनाने वाली सरकार की नीयत में ही खोट नज़र आता है। वे चुपचाप विदेशी विश्वविद्यालयों को बुला लेना चाहते हैं, भले ही इसके लिए अच्छे सरकारी संस्थानों को बर्बाद ही क्यों न करना पड़े।

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वे शिक्षा को स्किल तक सिमटा देना चाहते हैं, जबकि शिक्षा का दायरा इससे बहुत ज़्यादा बड़ा है। वे विश्वविद्यालयों में राजनीति नहीं देखना चाहते क्योंकि उन्हें फ़ंड में कटौती के विरोध और लाइब्रेरी की माँग में भी ‘गंदी राजनीति’ और हिंसा नज़र आती है, जबकि सच तो यह है कि कॉलेज और विश्वविद्यालय में हिंसा अधिकतर मामलों में राजनीति से नहीं, जातिवादी मानसिकता से होती हैI
इसीलिए तो कहता हूँ:

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हमें उनसे है शिक्षा नीति की उम्मीद
जो नहीं जानते शिक्षा क्या है !


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