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इंडिया गेट के मैदान में आयोजित विश्व खाद्य मेला एवं सम्मेलन के दूसरे दिन बनी 800 किलो से ज्यादा खिचड़ी को ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड’ की टीम ने गिनीज विश्व रिकॉर्ड का नाम दे दिया. लेकिन इन दौरान वे सेकड़ो सालों से बनती आ रही अजमेर दरगाह की उस खिंचड़ी को भूल गए जो हजारों किलों में बनती है.

आप को बता दें कि हजरत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में स्थित बड़ी देग जिसकों खुद मुगल बादशाह अकबर ने भेंट की थी में 4,800 किलोग्राम की खिंचड़ी सेकड़ों सालों से बनती आ रही है. जिसे आम बोलचाल में तबर्रुक कहा जाता है. इस तबर्रुक को दरगाह में जियारत के लिए आने वाले जायरीनों और गरीबों में तकसीम किया जाता है.

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दरअसल बादशाह अकबर ने प्रतिज्ञा की थी कि चितौड़गढ़ से युद्ध जीतने के बाद वे अजमेर दरगाह में एक बड़ी देग दान करेंगे. इस देग में उन्होंने एक बार में सवा सौ मन चावल पकवाए थे.

इसके अलावा दरगाह में एक और छोटी देग है जो मुग़ल बादशाह जहांगीर ने भेंट की थी. इस देग में 2240 किलोग्राम की खिचड़ी बनती है. इन दोनों ही देगों में सेकड़ों सालों से शुद्ध शाकाहारी सामग्री बनती आ रही है. जो कि विश्व खाद्य मेले में बनने वाली 800 किलो  खिचड़ी की तुलना में कई गुना ज्यादा है.

अब ऐसे में सवाल उठता है कि ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड’ की टीम ने 800 किलो की खिचड़ी को कैसे गिनीज विश्व रिकॉर्ड का नाम दे दिया. जबकि इस तरह की खिचड़ी भारत की कई दरगाहों में बनना आम बात है.


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