फिरंगीमहली ने कहा कि पहली बात तो ये है कि संविधान के मुताबिक देश के प्रति प्रेम प्रकट करने के लिए किसी तरह का नारा लगाने या नहीं लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है।

‘भारत माता की जय’ का नारा लगाने को लेकर मचे बवाल के बीच प्रख्यात इस्लामी विद्वान और आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के सदस्य खालिद रशीद फिरंगीमहली ने सोमवार को कहा कि दारूल उलूम जैसी संस्थाओं को संवेदनशील मुद्दों पर फतवा जारी करने से बचना चाहिए क्योंकि ऐसे फतवों से देश और समुदाय पर नकारात्मक असर हो सकता है।

फिरंगीमहली ने मीडिया से कहा, ‘‘नारे लगाने के मुद्दे में राजनीतिक मकसद भी शामिल हैं। दोनों ही समुदायों की सांप्रदायिक शक्तियों ने इस मुद्दे को विधानसभा चुनावों के मद्देनजर उछाला और यदि कोई मौलाना ऐसे संवेदनशील और राजनीतिक मसले पर फतवा जारी करता है तो इससे सांप्रदायिक शक्तियों को उनका लक्ष्य हासिल करने में मदद ही मिलेगी। हम क्यों ऐसे निहित स्वार्थी तत्वों के हाथों की कठपुतली बनें।’’उन्होंने कहा कि किसी मौलाना के लिए ऐसी कोई बाध्यता नहीं है कि वह उसके समक्ष उठाये गये हर मुद्दे पर फतवा जारी करे। यदि मौलाना को लगता है कि किसी फतवे का देश और समुदाय पर नकारात्मक असर होगा तो उसे ऐसा नहीं करना चाहिए।

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फिरंगीमहली ने कहा कि पहली बात तो ये है कि संविधान के मुताबिक देश के प्रति प्रेम प्रकट करने के लिए किसी तरह का नारा लगाने या नहीं लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि लेकिन मुस्लिमों ने आजादी की लडाई के दौरान ‘इंकलाब जिन्दाबाद’ तथा ‘जयहिन्द’ के नारे लगाये थे। यदि अनुवाद किया जाए तो ‘भारत माता की जय’ का मतलब भी वही है।

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उन्होंने कहा कि जब हम ये नारा लगाते हैं तो यह किसी मूर्ति के लिए नहीं बल्कि ऐसा करते समय देश का नक्शा हमारे मन में आता है। फिरंगीमहली ने कहा कि हिन्दुओं का एक बड़ा वर्ग मानता है कि बाबरी मस्जिद में राम लला की मूर्ति है लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि मुसलमानों को अपना दावा छोड़ देना चाहिए। ‘‘किसी भी मुद्दे पर नतीजे पर पहुंचने से पहले हम ऐतिहासिक तथ्यों और पृष्ठभूमि को देखेंगे।’’ एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी ने पिछले माह कहा था कि उनके गले पर चाकू रख दिया जाए तो भी वह ‘भारत माता की जय’ का नारा नहीं लगाएंगे क्योंकि ये उनके मजहब के खिलाफ है।

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दारूल उलूम देवबंद ने पिछले सप्ताह फतवा जारी कर कहा था कि मुसलमानों  को ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाने से बचना चाहिए क्योंकि यह इस्लाम के खिलाफ है।फतवे में कहा गया है कि ऐसा नारा तौहीद या एकरूप अल्लाह के खिलाफ है, वही अल्लाह जो इस्लाम के मूल में है। मौलाना ने तर्क दिया कि संविधान सभी नागरिकों को उनकी आस्था मानने की अनुमति देता है। (Jansatta.com)


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