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साल 2002 के गुलबर्ग सोसाइटी नरसंहार के पीड़ितों और प्रत्यक्षदर्शियों ने एक विशेष अदालत के फैसले पर जिसमे कहा गया है कि एहसान जाफरी द्वारा की गई गोलीबारी ने भीड़ को आक्रोशित करने के कारण हिंसा भड़की थी।

जाफरी के बेटे तनवीर ने कहा कि अदालत ने पूरी तरह से झूठे सबूत पर यकीन किया। साथ ही कुछ पीड़ितों के परिजनों ने कहा कि उनके द्वारा आत्मरक्षा में गोली चलाई गई थी और एक गवाह ने कहा कि, एहसान जाफरी द्वारा गोली चलाई ही नहीं गई थी।

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तनवीर ने कहा, हम इस फैसले से सहमत नहीं हैं जिसमें अदालत ने कहा कि एहसान जाफरी द्वारा गोली चलाए जाने ने भीड़ को उन्मादी बनाया। अदालत ने कुछ सबूतों पर भरोसा किया जो पूरी तरह से झूठे हैं। उन्होंने कहा कि बचाव पक्ष का वकील एक भी ऐसा गवाह पेश नहीं कर सका जो यह बताता कि उन्होंने जाफरी साहेब को अपनी बंदूक से गोली चलाते देखा था।

उन्होंने ऐसे व्यक्ति के बयान का जिक्र किया जो पीड़ित भी है और गवाह भी, जिसने पुलिस के समक्ष अपने बयान में कहा कि जाफरी साहेब ने अपनी बंदूक से गोली चलाई थी। यहां तक कि गवाही देने के लिए उसे अदालत में पेश नहीं किया गया।

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सईद खान पठान ने कहा कि सोसाइटी के बाहर भीड़ के जमा होने के बाद जाफरी ने आत्मरक्षा में गोली चलाई थी। पठान ने कहा कि यह कहना गलत है कि एहसान जाफरी की गोलीबारी के चलते सोसाइटी को निशाना बनाया गया।

भीड़ 28 फरवरी 2002 को सुबह 10 बजे से ही इकट्ठी होनी शुरू हो गई थी और उन्होंने पथराव किया तथा आगजनी की। गोली देर रात एक बजे चलाई गई। जाफरी ने आत्मरक्षा में गोली चलाई। इसलिए हम अदालत के निष्कर्ष को नहीं मानते।

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एक अन्य गवाह सलीम भाई सांधी ने कहा कि उन्होंने गोली चलने की आवाज कभी नहीं सुनी। जब भीड़ जाफरी के घर में जबरन घुसी थी तब वह भीड़ के पीछे थे। उन्होंने बताया कि उन्होंने अदालत से कहा कि ऐसी कोई चीज नहीं हुई थी। (भाषा)


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