नोटबंदी के एक साल पूरे होने पर अमेरिका के टफ्ट्स यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री भास्कर चक्रवर्ती ने हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू में दुसरे देशों को इस कदम से सबक लेने की नसीहत दी है. इस दौरान उन्होंने कहा कि इस फैसले को सही तरह से लागू किया गया तो भारतीय अर्थव्यवस्था और गरीबों पर नकारात्मक असर नहीं पड़ता.

उन्होंने नोटबंदी की समीक्षा के बाद निष्कर्ष के चार बिंदु निकालते हुए सबक लेने को कहा. साथ ही उन्होंने इस सबंध में अपने कुछ सुझाव भी पेश किये.

1. चक्रवर्ती ने कहा कि किसी भी नीति के आनुषंगिक परिणाम होते हैं इसलिए उन्हें लागू करने से पहले कुछ बुनियादी कवायदें जरूरी हैं. किसी भी नीति को लागू करने से पहले अर्थव्यवस्था, कारोबार और तकनीक क्षेत्र के विशेषओं का समेकित विचार जानना जरूरी है. भारत जैसी जटिल आर्थिकी वाले देश में ये और भी महत्वपूर्ण हो जाता है. भास्कर ने लिखा है कि भारत ने नोटबंदी लागू करने के खिलाफ रघुराम राजन जैसे काबिल आदमी की राय को नकार दिया.

2. उन्होंने सभी नीतियों का उद्देश्य जनकल्याण होता है लेकिन हर नीतिगत निर्णय के कुछ नकारात्मक पक्ष होते हैं. जन साधारण के फायदे में लिए गये फैसले समाज के किसी एक वर्ग के लिए भारी साबित होते हैं. भास्कर के अनुसार इसलिए किसी भी नीतिगत फैसले के पहले तथ्य आधारित नफा-नुकसान का मुल्यांकन जरूरी है. भास्कर के अनुसार किसी भी नीति को लागू करने से पहले उससे जुड़े बुनियादी आंकड़ों का विश्लेषण कर लेना चाहिए.

भास्कर के अनुसार सबसे पहले, एक झटके में 86 प्रतिशत नकदी को गैर-कानूनी घोषित करने का फैसले को लेकर सरकार को पहले ही अति-सावधान हो जाना चाहिए था  क्योंकि इससे अर्थव्यवस्था में अफरा-तफरी मचने की आशंका थी. इसके अलावा भारत का 90 प्रतिशत कामगार वर्ग असंगठित क्षेत्र में काम करता है जिसे नकद मेहनताना मिलता है. देश की अर्थव्यवस्था पर पड़नी वाली इस दोहरी मार को नजरंदाज करना मुश्किल था.

3. भास्कर के अनुसार किसी भी नीति को लागू करने से पहले व्यावहारिक दिक्कतों पर विचार करना जरुरी है, लेकिन नोटबंदी मसले पर मोदी सरकार ने ऐसा नहीं की. सरकार ये नहीं भांप पायी कि लोग इतनी आसानी से पैसे नहीं छोड़ेंगे और इससे बचने के लिए वो कोई न कोई रास्ता जरुर निकाल लेंगे. भास्कर ने आरबीआई के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि नोटबंदी के बाद 500 और 1000 रुपए में मौजूद करीब 99 प्रतिशत राशि बैंकों में वापस आ गई. जिससे साफ है कि नोटबंदी से कालेधन के रद्दी में बदल जाने का बुनियादी तर्क गलत साबित हुआ.

4. भास्कर के मुताबिक, मोबाइल संचार और डिजिटल तकनीक कई बार ये भ्रम फैला देते हैं कि ये चीजें बदलाव ला सकती हैं. उनका मानना है कि मोबाइल और डिजिटल टेक्नोलॉजी व्यवस्था को बेहतर बनाने में काफी मददगार हैं लेकिन  बगैर बुनियादी तैयारी के इनपर पूरी तरह निर्भर होना सही नहीं. भास्कर मानते हैं कि नोटबंदी के मामले में भी यही हुआ. नोटबंदी के बाद जब मोदी सरकार नकदी की कमी की भरपाई करने में विफल रही तो उनसे अपना एजेंडा बदलते हुए इसे अर्थव्यवस्था के डिजिटलीकरण की दिशा में उठाया गया कदम बताना शुरू कर दिया.


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