बरेली – मौलाना तौकीर रजा के देवबंद जाने के मसले और देवबंदी-बरेलवी के एक प्लेटफार्म पर आने को लेकर दरगाह-ए-आला हज़रत से एक प्रेस नोट जारी किया गया है। जिसमे कहा गया है की अगर गुस्ताख-ए-रसूल को देवबंदी मसलक के लोग इस्लाम से ख़ारिज माने तथा उनकी किताबों,वहाबी विचारधारा को पूरी तरह से बंद करे तब कहीं जाकर इत्तेहाद की उम्मीद की जा सकती है। उनका कहना है कि अल्लाह और रसूल की शान में गुस्ताखी करने पर वर्ष 1906 में आला हजरत ने देवबंदी आलिमों पर कुफ्र का फतवा लगाया था। ऐसे में इत्तेहाद की बात आती है तो पहले बुनियादी मसलों को हल करने की जरूरत है।

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चार शर्त माने तब होगा इत्तेहाद

(1) अल्लाह और रसूल की शान में जिन चार देवबंदी आलिमों ने गुस्ताखी वाली बातें लिखीं उनकी सारे देवबंदी मसलक के लोग उन्हें इस्लाम से खारिज मानें.
(2) इन आलिमों की लिखी हुई उन किताबों ‘तहज़ीरुन्नास’, ‘हिफ़्जुल ईमान’, ‘बराहीने कातेआ’ और ‘तकबियतुल ईमान’ जैसी किताबों के छापने पर पाबंदी लगाई जाए.
(3) आलाहजरत और मक्का व मदीना के आलिमों और मुफ्तियों के दिये हुए फतवों की किताब की हर हर्फ ब हर्फ (शब्दश:) तस्दीक करें.
(4) इस्लाम को बदनाम करने वाली और पूरी दुनिया में आतंक का पोषण करने वाली वहाबी विचार धारा से अपने आप को अलग करने का ऐलान करें।
दरगाह से हमें तनख्वाह जरूर मिलती है लेकिन जब बात शरीयत की आती है तो फतवा कुरान हदीस की रौशनी में दिया जाता है। किसी के दवाब या सिफारिश पर फतवा जारी नहीं करता है।
मुफ्ती सलीम नूरी, दरगाह आला हजरत

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