‘जिंदगी में कुछ भी हो सकता है, अगर करने की चाहत और जूनून हो’ ये यूपीएससी में 420 वीं रैंक हासिल करने वाली उम्मुल खेर की कामयाबी से पता चलता है.

उम्मुल का जन्म राजस्थान के पाली मारवाड़ में हुआ. उम्मुल अजैले बोन डिसऑर्डर बीमारी के साथ पैदा हुई थी, एक ऐसा बॉन डिसऑर्डर, जो बच्चे की हड्डियां कमजोर कर देता है. हड्डियां कमजोर हो जाने की वजह से जब बच्चा गिर जाता है तो फ्रैक्चर होने की ज्यादा संभावना रहती है. इसी के चलते उन्हें 16 फ्रेक्चर, 8 सर्जरी का सामना करना पड़ा. इस लाइलाज बिमारी के होने के बावजूद उम्मुल ने ये कामयाबी पहली बार में ही हासिल की है.

हिंदुस्तान अख़बार को दिए इंटरव्यू में उम्मुल खेर ने बताया कि  जब वह पांच साल की थीं। वह बताती हैं कि गरीबी थी। हम तीन भाई-बहन का परिवार था. पिता यहां दिल्ली आ गए। पिता के जाने से मां को सीजोफ्रीनिया(मानसिक बीमारी) के दौरे पड़ने लगे। वह प्राइवेट काम करके हमें पालती थीं. मगर बीमारी से उनकी नौकरी छूट गई. दिल्ली में फेरी लगाकर कमाने वाले पिता हमें अपने साथ दिल्ली ले आ. यहां हम हजरत निजामुद्दीन इलाके की झुग्गी-झोपड़ी में रहने लगे. 2001 में यहां से झोपड़ियां उजाड़ दी गईं. हम फिर से बेघर हो गए.

मैं तब सातवीं में पढ़ रही थी. पिता के पैसे से खर्च नहीं चलता था तो मैं झुग्गी के बच्चों को पढ़ाकर 100-200 रुपये कमा लेती थी. उन्हीं दिनों मुझे आईएएस बनने का सपना जागा था. सुना था कि यह सबसे कठिन परीक्षा होती है. हम त्रिलोकपुरी सेमी स्लम इलाके में आकर रहने लगे. घर में हमारे साथ सौतेली मां भी रहती थीं. हालात पढ़ाई लायक बिल्कुल नहीं थे. मुझे याद है कि तब तक कई बार मेरी हड्डियां टूट चुकी थीं. पिता ने मुझे शारीरिक दुर्बल बच्चों के स्कूल अमर ज्योति कड़कड़डूमा में भर्ती करा दिया. यहां पढ़ाई के दौरान स्कूल की मोहिनी माथुर मैम को कोई डोनर मिल गया. उनके पैसे से मेरा अर्वाचीन स्कूल में नौवीं में दाखिला हो गया. दसवीं में मैंने कला वर्ग से स्कूल में 91 प्रतिशत से टॉप किया. उधर, घर में हालात बदतर होने लगे थे. मैंने त्रिलोकपुरी में अकेले कमरा लेकर अलग रहने का फैसला कर लिया. वहां मैं अलग रहकर बच्चों को पढ़ाकर अपनी पढ़ाई करने लगी.

अब 12वीं में भी 89 प्रतिशत में मैं स्कूल में सबसे आगे रही. यहां मैं हेड गर्ल ही रही. कॉलेज जाने की बारी आई तो मन में हड्डियां टूटने का डर तो था. फिर भी मैंने डीटीसी बसों के धक्के खाकर दिल्ली विश्वविद्यालय में दाखिला लिया. यहां से फिर जेएनयू से शोध और साथ में आईएएस की तैयारी. हंसते हुए कहती हैं बाकी परिणाम आपके सामने है ..और सफर जारी है. घरवालों ने भी फोन करके बधाई दी है. भाई-बहन बहुत खुश हैं.


Urdu Matrimony - मुस्लिम परिवार में विवाह के लिए अच्छे खानदानी रिश्तें ढूंढे - फ्री रजिस्टर करें



loading...
कोहराम न्यूज़ की एंड्राइड ऐप इनस्टॉल करें

अभी पढ़ी जा रही ख़बरें

SHARE