नई दिल्ली | 8 नवम्बर 2016 को नोट बंदी की घोषणा करते समय प्रधानमंत्री मोदी ने देश को सपने दिखाए थे की हर समस्या का हल नोट बंदी है. उन्होंने कहा था की केवल 50 दिन दे दीजिये, आपको आपके सपनो का भारत दे दूंगा. लेकिन नोट बंदी के दस महीने बाद आरबीआई की रिपोर्ट ने यह बात स्पष्ट कर दी की नोट बंदी फेल रही है. इसके अलावा नोट बंदी से देश की आर्थिक रफ़्तार भी सुस्त हुई है.

ताजा आंकड़ो के अनुसार जून में खत्म हुई तिमाही में देश की जीडीपी दर 5.7 फीसदी दर्ज की गयी जो पिछले साल के मुकाबले करीब करीब दो फीसदी कम है. हालाँकि सरकार यह मानने के लिए तैयार नही है की नोट बंदी अपने उद्देश्यों में सफल नही रही. लेकिन दुनिया के बड़े आर्थिक विशेज्ञ में से एक मार्क फेबर इससे इत्तेफाक नही रखते. उनके अनुसार नोट बंदी एक आपदा थी जो अपने लक्ष्यों को हासिल नही कर पायी.

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आर्थिक और वित्तीय प्रकाशन ‘द ग्लूम, बूम एंड डूम रिपोर्ट’ के संपादक और प्रकाशक मार्क फैबर ने शुक्रवार को बीटीवीआई को दिए इंटरव्यू में कहा,’ हम सभी जानते है की नोट बंदी एक आपदा थी, इसके लक्ष्य को हासिल नही किया गया. इसे सौम्य तरीके से किया जा सकता था , जिसमे छह महीने का समय दिया जा सकता था. इस दौरान पुराने नोटों का आदान प्रदान किया जा सकता था जिससे किसी को भी नुकसान नही पहुंचे.’

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मार्क फेबर ने मोदी सरकार के इस फैसले की आलोचना करते हुए कहा की यह कदम शिक्षाविदों की सलाह पर आधारित था, जिसमें सरकार के लोगों को यह पता नहीं था कि बाजार कैसे काम करता है. फेबर ने कहा कि नोटबंदी का उद्देश्य संगठित अपराध को काबू में करना था, जो कि नकदी की प्रचुरता से बढ़ता है, लेकिन इन दिनों उनके पास पैसे उधार देने के अन्य साधन भी हैं. जीएसटी पर फेबर ने कहा की इसमें कर डरे काफी रखी गयी है जिससे कालाबाजारी को बढ़ावा मिल सकता है.

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