नई दिल्ली। देश 8 मार्च को महिला दिवस मनाने की तैयारी कर रहा है।  इस दिन को मनाने के लिए एक बार फिर देश भर में छोटे-बड़े आयोजन होंगे। हर बार की तरह इस बार भी ऐसे आयोजनों में महिला हिंसा, महिला सशक्तिकरण और महिला सुरक्षा जैसे विषयों पर मंथन होगा।

women violence

सियासी नेताओं समेत विभिन्न वर्गों से जुडी शख्सियतें एक्सपर्ट्स के तौर पर इन तमाम विषयों पर अपनी राय रखेंगे। सत्ता में बैठे लोग भी विरोधी दलों पर निशाना साधते हुए अपनी पीठ थपथपायेंगे और भविष्य में महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों और हिंसाओं की संख्या में नियंत्रण लाने का दावा ठोकेंगे।
लेकिन इन सब के बीच वही सवाल गूंजता सुनाई देगा कि क्या देश में महिलाओं को सुरक्षा मिल पाएगी। सवाल उठेगा कि आखिर क्या वजह है कि सरकार की तरफ से महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण को लेकर जारी किये जाने वाले भारी भरकम बजट, बनाये जाने वाले कड़े कानूनों और जागरूकता अभियानों के बावजूद महिलाओं के प्रति अपराध कम होने का नाम नहीं ले रहे हैं।
बहरहाल, आंकड़ों में नज़र डालें तो महिलाओं के प्रति हो रहे अपराधों में साल दर साल इज़ाफ़ा हो।  चाहे सरकार ‘अच्छे दिन’ के वादे कर रही हो लेकिन हकीकत इन सब से परे है। 
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़ों के अनुसार 2012 से लेकर 2014 के बीच भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज मामलों की कुल संख्या में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। इन आंकड़ों के अनुसार 2012 में जहां ऐसे कुल 23 लाख 87 हजार 188 मामले पुलिस में दर्ज हुए वहीं 2013 में यह बढ़कर 26 लाख 47 हजार 722 पर पहुंच गई। 2014 तक इनकी संख्या 28 लाख 51 हजार 563 पर पहुंच गई। 
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दुष्कर्म की कोशिशों के मामलों में हो रहा इज़ाफ़ा  
महिलाओं के प्रति अपराधों में सबसे ज़्यादा तेज़ी दुष्कर्म की कोशिश करने के मामलों में देखी जा रही। साल 2012 में जहां ऐसे 45 हजार 351 मामले दर्ज हुए वहीं दूसरे साल 2013 में इनकी संख्या बढ़कर 70 हजार 739 हो गई और 2014 में यह आंकड़ा 82 हजार 235 पर पहुंच गया। 
दुष्कर्म के मामले भी पीछे नहीं  
दुष्कर्म के मामलों में भी लगातार बढ़ोतरी होती जा रही है । वर्ष 2012 में ऐसे कुल 24 हजार 923 मामले पुलिस में दर्ज हुए, अगले साल इनकी संख्या बढ़कर 33 हजार 707 हो गई और 2014 में यह आंकड़ा 36 हजार 735 के स्तर पर आ गया। 
नहीं थम रहे घरेलू हिंसा के मामले  
पति और परिजनों द्वारा महिलाओं पर घरेलू हिंसा के मामाओं पर भी नियंत्रण नहीं देखा जा रहा है। 2012 में ऐसे कुल 1 लाख 6 हज़ार 527 मामले दर्ज हुए थे जबकि 2013 में इनकी संख्या बढ़कर 1 लाख 18 हज़ार 866 हो गई थी और 2014 में यह आंकड़ा 1 लाख 22 हज़ार 877 पर पहुंच गया था।
दहेज़ ह्त्या मामलों में मिला-जुला असर 
रिकॉर्ड के मुताबिक़ दहेज हत्या के मामलों में मिश्रित रुख देखा जा रहा है। साल 2012 में दहेज हत्या के 8 हज़ार 233 मामले दर्ज हुए जबकि अगले साल यह घटकर 8 हज़ार 83 पर आ गए लेकिन 2014 में इनमें फिर से तेजी आई और यह 8 हज़ार 455 पर पहुंच गए।
 
अन्य मामलों के आंकड़े भी चिंताजनक 
अन्य अपराधों में सबसे ज्यादा मामले चोरी से जुड़ी घटनाओं के रहे। इनमें 2012 से 2014 के बीच कुल 1 लाख 3 हज़ार 508 की वृद्धि दर्ज हुई। इस अवधि में हत्या के प्रयास से जुड़ी घटनाएं भी बढ़ीं। जहां 2012 में ऐसे 35 हज़ार 138 मामले दर्ज हुए वहीं अगले साल यह बढ़कर 35 हज़ार 417 पर और 2014 में 41 हज़ार 791 हो गई। हालांकि हत्या जैसे अपराध में गिरावट देखी गई। साल 2012 से साल 2014 के बीच ऐसे अपराध में 453 की कमी आई। 
अपहरण का ग्राफ भी परवान पर 
कानून व्यवस्था चाक चौंबद बनाए रखने के पुलिस के बड़े दावों के बीच महिलाओं के अपहरण की घटनाएं भी लगातार बढ़ रही हैं। पुलिस में 2012 में ऐसे कुल 47 हज़ार 592 मामले दर्ज हुए। अगले साल 2013 में इनकी संख्या 65 हज़ार 461 हो गई और 2014 में ऐसे कुल 77 हज़ार 237 मामले पुलिस में दर्ज हुए। 
दलित महिलाएं भी  हो रही शिकार 
सरकार की ओर से दलितों के संरक्षण के लिए कई योजनाएं लाने के बावजूद दलितों के खिलाफ अपराध का ग्राफ नहीं थम रहा है। 2012 में दलितों के खिलाफ अत्याचार के कुल 33 हज़ार 593 मामले दर्ज किए गए जिनकी संख्या अगले साल 39 हज़ार 346 पर पहुंच गई और 2014 में यह आंकड़ा 40 हज़ार 300 पर जा पहुंचा। 
राजस्थान तीसरे पायदान पर, एमपी अव्वल  
अपराध के राज्यवार आंकडों के अनुसार 2012 से लेकर 2014 के बीच सबसे ज्यादा 2 लाख 20 हज़ार 335 मामले मध्यप्रदेश में दर्ज हुए। दूसरा नबंर उत्तर प्रदेश का रहा जहां इस अवधि में कुल 1 लाख 98 हज़ार 93 मामले दर्ज हुए। राजस्थान तीसरे पायदान पर है जहां इस अवधि में कुल 1 लाख 70 हज़ार 948 मामल दर्ज किए गए। (राजस्थान पत्रिका)

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