सन 2000 में रोजगावं रेलवे स्टेशन पर हुए साबरमती एक्सप्रेस में ब्लास्ट सहित 11 आतंक के मामलों से बरी हुए कश्मीर के पाटन इलाक़े के गुलज़ार वानी को बाराबंकी की एक अदालत ने मुआवजा देने का आदेश सुनाया है. अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को जेल में गुजरे वानी के वक्त के लिए उनकी शैक्षिक नुकसान के साथ औसत आमदनी को देखते हुए उन्हें मुआवजा देने का निर्देश दिया है.

कोर्ट ने कहा है कि वानी को मुआवजा उनकी शैक्षणिक योग्यता के हिसाब से एवरेज इन्कम के आधार पर दिया जाए और मुआवजे की रमक उतने समय की आमदनी के आधार पर होनी चाहिए जितना वानी ने जेल में गुजारा. वानी को  दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने 2001 में उठाया था. इस दौरान उनकी उम्र 28 साल थी और वह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर रहे थे.

अदालत ने जांच में उत्तरप्रदेश सरकार को उसके अधिकारियों की लापरवाही के कारण राज्य के खजाने को पहुंचे नुकसान के लिए जिम्मेदार ठहराया. अदालत ने कहा कि अधिकारियों ने आरोपी पर मुकदमा चलाने के लिए मंजूरी नहीं ली और अपने कर्तव्य से हटते हुए एक आरोप पत्र दायर कर वानी की भौतिक आजादी का उल्लंघन किया और उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से नुकसान पहुंचाया.

कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकार चाहे तो जिम्मेदार अधिकारियों से भी मुआवजे की रकम वसूल सकती है. अगर सरकार मुआवजा नहीं देगी तो वानी इलाहाबाद हाईकोर्ट जाने के लिए स्वतंत्र होंगे. बता दें ब्लास्ट मामले में गुलजार अहमद वानी के अलावा उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थ नगर के रहने वाले अब्दुल मोबीन को भी गिरफ्तार किया गया था. उन्हें भी अदालत ने बरी कर दिया है.

हाल ही में अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने 11 में से 10 आरोपों में बरी होने के बावजूद गुलजार अहमद वानी को जमानत न दिए जाने को ‘शर्मनाक’ बताया था. साथ ही उनके खिलाफ बाराबंकी की अदालत में सुनवाई की धीमी रफ्तार पर भी लताड़ लगाईं थी.

जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली दो सदस्यीय पीठ ने बीते अप्रैल को इस मामले को संज्ञान में लेते हुए कहा था, ‘अगर बाराबंकी में वर्ष 2000 में साबरमती एक्सप्रेस में हुए धमाके के मामले में 31 अक्टूबर तक अहम गवाहों के बयान दर्ज नहीं हुए तो एक नवंबर को आरोपी को जमानत दे दी जाएगी.’ कोर्ट ने इसे अगले छह महीने में पूरा करने का आदेश दिया था.


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