2011-15 के बीच चीन ने पाकिस्तान को 2,988 मिलियन डॉलर के हथियार बेचे हैं। बांग्लादेश ने 1,650 मिलियन डॉलर और म्यांमार ने 1,338 मिलियन डॉलर की राशि के हथियार चीन से खरीदे हैं।

भारत के पड़ोसी देशों को हथियारों की आपूर्ति के पीछे चीन की गहरी चाल है। चीन बेहद आसान कर्ज और कम कीमतों पर भारत के पड़ोसी देशों को हथियार मुहैय्या कराता है।

खालिदा जिया की सरकार के समय बांग्लादेश और चीन के बीच अच्छे संबंध थे जिसका चीन ने भरपूर फायदा उठाया था। सैन्य शासन के दौर में म्यांमार पर पश्चिमी देशों ने प्रतिबंध लगा रखे थे, चीन ने इन प्रतिबंधों  का इस्तेमाल भी अपना हित साधने में किया।

श्री लंका को भी अपने हथियार बेचने की चीन ने जीतोड़ कोशिश की| चीन द्वारा निर्मित पाकिस्तानी विमान जेएफ-17 की खरीद पर श्री लंका सहमत भी हो गया था लेकिन भारत की  बेहतरीन कूटनीति ने सौदे को होने नहीं दिया।

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2006-10 के मुकाबले 2011-15 के बीच चीन के हथियारों का निर्यात 88 फीसदी बढ़ा है। इतनी तेजी से किसी भी देश के हथियारों का निर्यात नहीं बढ़ा है। चीन का अब अधिकांश आयात ईंजन का होता है।

2015 में चीन ने रूस से वायु रक्षा प्रणाली और 24 लड़ाकू विमान खरीदने का सौदा किया है।

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक, “इससे जाहिर होता है कि चीन अब भी रक्षा उपकरणों के मामले में आत्मनिर्भर नहीं बन सका है|”

स्वदेशीकरण पर जोर दे रहे भारत के लिए चिंता की यह एक और बात है।

2006-10 के मुकाबले 2011-15 के बीच भारत में हथियारों का आयात 90 फीसदी बढ़ा है।

जबकि, चीन हथियारों के आयात में 25 फीसदी की कमी लाया है। चीन के कुल आयात की 59 फीसदी आपूर्ति रूस कर रहा है।

सबसे चौंकाने वाला देश वियतनाम है।

दक्षिण चीन सागर में बढ़ती तनातनी के बीच वियतनाम हथियारों के खरीदार के रूप में दुनिया में 43 वें स्थान से आठवें स्थान पर आ गया है।

दिलचस्प बात यह है कि वियतनाम की 93 फीसदी हथियारों की जरूरत रूस पूरी कर रहा है। जिनमें पनडुब्बी से लेकर लड़ाकू विमान शामिल हैं।


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