चीफ जस्‍ट‍िस ऑफ इंडिया टीएस ठाकुर रविवार को एक कार्यक्रम में भाषण के दौरान भावुक हो गए। मुख्य न्यायाधीश का पूरा भाषण लंबे समय से लंबित पड़े न्यायिक सुधार और क्षमता से कहीं कम जजों की मौजूदगी के इर्द गिर्द था। इस दौरान कई बार उनका गला रुंध गया। वे न्‍यायपालिका में जजों की संख्‍या और ज्‍यादा बढ़ाने पर जोर दे रहे थे। इस मौके पर पीएम नरेंद्र मोदी भी वहां मौजूद थे।

ठाकुर ने मांग की कि केसों की बढ़ती संख्‍या के मद्देनजर जजों की संख्‍या में बड़े पैमाने पर इजाफा किया जाना चाहिए।उन्होंने कहा कि ज्यूडिशरी की मांग के बावजूद कई सरकारें इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाने में नाकाम रही। केसों की लगातार बढ़ती संख्या के लिए केवल जस्टिस सिस्टम को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। ठाकुर के मुताबिक, जजों को बेहद दबाव के माहौल में केसों का निस्‍तारण करना पड़ रहा है।

ठाकुर ने कहा कि बाहरी देशों के जज इस बात पर आश्‍चर्य करते हैं कि कैसे भारतीय जज इतने सारे केसों को निपटाते हैं। एक भारतीय जज औसतन 2600 जबकि अमरीकी जज 81 केसों का फैसला करा है। मंच पर मोदी से मुखातिब होते हुए ठाकुर ने कहा,सुप्रीम कोर्ट की शुरुआत आठ जजों के साथ हुई थी। उस वक्त 1251 मामले थे। इस तरह से एक जज के पास 100 केस थे। 1960 के दशक में सुप्रीम कोर्ट के स्वीकृत जजों की संख्या 14 हुई और मामलों की संख्या बढ़कर 3 हजार 247 हो गई। 1977 में जजों की संख्या बढ़कर 18 हुई और केसों की संख्या बढ़कर 14 हजार 501 हो गई। 1986 में जजों की संख्या 26 की गई लेकिन मामले बढ़कर 27 हजार 881 हो गई। 2009 में जजों की संख्या 31 हुई और मामले बढ़कर 77 हजार 151 हो गए। 2014 में 31 जजों के साथ केसों की संख्या 81 हजार 83 मामलों का बैकलॉग है।


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