शाही इमाम के ऑफिस की ओर से जानकारी दी गई है कि उन्‍होंने प्रधानमंत्री के सामने जामिया मिलिया इस्‍लामिया तथा एएमयू के मुद्दे पर भी चर्चा की।

दिल्‍ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम बुखारी सोमवार को पीएम मोदी से मिलने पहुंचे। शाही इमाम के ऑफिस की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, मुलाकात के दौरान उन्‍होंने प्रधानमंत्री के सामने उन युवाओं का मुद्दा उठाया, जिन्‍हें इस्‍लामिक स्‍टेट (ISIS) से संबंधों के आरोपों में पकड़ा जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, इमाम बुखारी सोमवार दोपहर सात रेसकोर्स रोड पहुंचे थे। प्रधानमंत्री से मुलाकात के दौरान उन्‍होंने पूरे मामले में पारदर्शिता बरतने की बात कही और जामिया मिलिया इस्‍लामिया तथा एएमयू मुद्दे पर भी चर्चा की। इन दोनों यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर विवाद चल रहा है।

गौरतलब है कि 26 जनवरी से ठीक पहले नेशनल जांच एजेंसी(एनआईए) ने 18 संदिग्‍ध आतंकियों को गिरफ्तार किया था। इनमें कर्नाटक, उत्‍तर प्रदेश, राजस्‍थान और महाराष्‍ट्र से युवकों को गिरफ्तार किया गया था। सूत्रों के अनुसार एनआईए ने कई महीनों की निगरानी के बाद इन्‍हें पकड़ा। ये युवक आईएसआईएस की विचारधारा से प्रेरित थे। साथ ही इंटरनेट पर आईएस समर्थक कंटेट शेयर करते थे। इन युवकों की गिरफ्तारियां एनएसए अजीत डोभाल की निगरानी में की गई थी।

आपको बता दें कि शाही इमाम बुखारी के नरेंद्र मोदी के साथ अच्‍छे रिश्‍ते नहीं रहे हैं। 22 नवंबर 2014 को उन्‍होंने अपने बेटे शाबान को उत्‍तराधिकारी (शाही नायब इमाम) घोषित किया था। शाबान की दस्‍तारबंदी का कार्यक्रम नेशनल मीडिया में चर्चा का कारण बना था, क्‍योंकि उन्‍होंने पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री को न्‍योता भेजा था, लेकिन पीएम नरेंद्र मोदी को नहीं बुलाया था। इसकी वजह बताते हुए बुखारी ने कहा था, ‘देश के मुसलमान अब तक उनसे (मोदी से) जुड़ नहीं पाए हैं। पीएम को मुसलमानों में विश्वास जगाने के लिए आगे आना चाहिए।’

350 साल से भी पुरानी है शाही इमाम की परंपरा: जामा जामा मस्जिद 1656 में तैयार हुई थी। 24 जुलाई 1656, दिन सोमवार ईद के मौके पर मस्जिद में पहली नमाज पढ़ी गई। नमाज के बाद इमाम गफूर शाह बुखारी को बादशाह की तरफ से भेजी गई खिलअत (लिबास और दोशाला) दी गई और शाही इमाम का खिताब दिया गया। तभी से शाही इमाम की यह रवायत बरकरार है। साभार: जनसत्ता


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