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तीन तलाक को लेकर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में एक और हलफनामा दाखिल किया हैं. जिसमे बोर्ड ने तीन तलाक को मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकारों का हनन बताने को लेकर आलोचना करते हुए कहा कि केंद्र सरकार का यह रुख बेकार हैं.

हलफनामे में आगे कहा गया कि इस मामलें में दाखिल याचिकाओं को खारिज किया जाना चाहिए क्योंकि याचिका में जो सवाल उठाए गए हैं वे जूडिशियल रिव्यू के दायरे में नहीं आते. साथ ही कहा गया कि पर्सनल लॉ को चुनौती नहीं दी जा सकती. सोशल रिफॉर्म के नाम पर मुस्लिम पर्सनल लॉ को दोबारा नहीं लिखा जा सकता. क्योंकि यह प्रैक्टिस संविधान के अनुच्छेद-25, 26 और 29 के तहत प्रोटेक्टेड है.

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इसके अलावा मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कॉमन सिविल कोड संविधान के डायरेक्टिव प्रिंसिपल का पार्ट बताते हुए कहा कि पर्सनल लॉ को मूल अधिकार की कसौटी पर चुनौती नहीं दी जा सकती. ट्रिपल तलाक, निकाह हलाला जैसे मुद्दे पर कोर्ट अगर सुनवाई करता है तो यह जूडिशियल लेजिस्लेशन की तरह होगा.

गौरतलब रहें कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर तीन तलाक का विरोध करते हुए कहा कि तीन तलाक को संविधान के तहत दिए गए समानता के अधिकार और भेदभाव के खिलाफ अधिकार के संदर्भ में देखा जाना चाहिए.

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