अदालत ने कहा कि वह अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने की जगह पर राम मंदिर के निर्माण की अनुमति के लिए निर्देश देने की मांग करने वाली याचिका पर इसे (निर्माण की अनुमति को) मौलिक अधिकार के रूप में मानकर अलग से सुनवाई नहीं कर सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी को अयोध्या मालिकाना विवाद से संबंधित लंबित मामलों में हस्तक्षेप करने की अनुमति दे दी। स्वामी ने ढहाए गए विवादित ढांचे के स्थल पर राम मंदिर निर्माण के लिए याचिका दायर की है। न्यायमूर्ति वी गोपाल गौड़ा और न्यायमूर्ति अरुण मिश्र की पीठ ने स्वामी की नई याचिका को लंबित दीवानी अपीलों के साथ नत्थी कर दी। अदालत ने कहा कि वह अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने की जगह पर राम मंदिर के निर्माण की अनुमति के लिए निर्देश देने की मांग करने वाली याचिका पर इसे (निर्माण की अनुमति को) मौलिक अधिकार के रूप में मानकर अलग से सुनवाई नहीं कर सकती।

अदालत ने कहा कि मामले को लंबित दीवानी अपीलों के साथ नत्थी किया जाए। पक्षों को प्रतियां उपलब्ध कराई जाएं। स्वामी ने तर्क दिया कि सरकार पहले ही हलफनामा दे चुकी है कि यदि सबूत हो तो वह मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करेगी। इसके अतिरिक्त, इस संबंध में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निष्कर्ष भी हैं। शुरू में पीठ ने कहा कि जब दीवानी अपील उसके समक्ष लंबित हैं तो वह रिट याचिका पर विचार नहीं कर सकती। स्वामी को या तो अपने मौलिक अधिकार के प्रवर्तन के लिए हाईकोर्ट जाना चाहिए या यहां लंबित दीवानी अपीलों में पक्षकार बनने की मांग करनी चाहिए।

स्वामी ने इससे पूर्व अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर निर्माण की अनुमति के लिए निर्देश दिए जाने के वास्ते याचिका दायर की थी। इसका उल्लेख तत्काल सुनवाई के लिए प्रधान न्यायाधीश टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष किया था। उन्होंने अपनी याचिका में दावा किया कि इस्लामी देशों में मौजूद चलन के तहत किसी मस्जिद को सड़क निर्माण जैसे सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए किसी दूसरे स्थान पर स्थानांतरित किया जा सकता है। जबकि यदि मंदिर का निर्माण एक बार हो जाए तो उसे छूआ नहीं जा सकता। स्वामी ने अपनी याचिका में दावा किया कि जहां तक पवित्रता का सवाल है किसी मंदिर और मस्जिद को बराबर नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ के बहुमत वाले आदेश के मुताबिक मस्जिद इस्लाम धर्म का आवश्यक हिस्सा नहीं है, जबकि हाउस आॅफ लॉर्ड्स, ब्रिटेन (1991) के मुताबिक मंदिर हमेशा मंदिर रहता है, चाहे यह इस्तेमाल नहीं हो रहा हो या फिर खंडहर हो। इसलिए मूल सच यह है कि राम जन्मभूमि पर राम मंदिर का स्थल को लेकर किसी मस्जिद से ज्यादा प्रभावी दावा है।

स्वामी ने उन कई याचिकाओं को तेजी से निपटाने का निर्देश दिए जाने का भी आग्रह किया है, जिनमें अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद स्थल को तीन हिस्सों में बांटने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के 30 सितंबर 2010 के आदेश को चुनौती दी गई है। स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश देते हुए शीर्ष अदालत ने केंद्र के अधिग्रहण वाली पास की 67 एकड़ जमीन पर किसी तरह की धार्मिक गतिविधि पर रोक लगाई थी। यथास्थिति बनाए रखने का मतलब यह है कि अयोध्या में विवादित स्थल पर रामलला के अस्थायी मंदिर में प्रार्थना हमेशा की तरह होती रहेगी । (Jansatta)

 


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