नई दिल्ली | पिछले साल नवम्बर में नोट बंदी की घोषणा करते समय प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था की सरकार के इस फैसले से कालेधन रखने वालो की कमर टूटेगी और भारत विकास के नये पहियों पर सरपट दौड़ने लगेगा. उस समय मोदी ने देश से 50 दिन मांगते हुए कहा था की आप मुझे 50 दिन दे दीजिये , मैं आपको आपके सपनो का भारत दे दूंगा. हालाँकि नोट बंदी हुए 8 महीने हो चुके है लेकिन अभी तक उस सपने वाले भारत का कही अता पता नही है.

इसी बीच बहुत सारी ऐसे रिपोर्ट सामने आई है जिन्होंने यह साबित किया है की मोदी सरकार का यह कदम भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए घातक साबित हुआ है. खुद भारत सरकार की रिपोर्ट ने आखिरी तिमाही के जो आंकड़े सामने रखे है उनसे केवल निराशा ही हाथ लगी है. इन आंकड़ो के अनुसार इस वित्त वर्ष के आखिरी तिमाही यानि जनवरी से मार्च के बीच में देश की जीडीपी गिरकर 6.1 फीसदी पर आ गयी.

जो अभी तक 8 फीसदी के करीब चल रही थी. यह वही समय है जब नोट बंदी हुए 50 दिन हो चुके थे. सरकार के आंकड़ो के बाद अमेरिका की मशहूर मैगज़ीन ने भी मोदी सरकार के फैसले पर गंभीर सवाल खड़े किये है. उन्होने मोदी के इस फैसले को विघटनकारी प्रयोग बताते हुए कहा की इसकी वजह से भारत की अर्थव्यवस्था को एतिहासिक नुक्सान झेलना पड़ा है .

अमेरिका की फॉरेन अफेयर्स मैगजीन ने अपने ताजा संस्करण में जेम्स क्रेबट्री के हवाले से लिखा की नोट बंदी ने साबित कर दिया की यह सबसे ज्यादा नुक्सान पहुँचाने वाला प्रयोग था. मोदी सरकार की आर्थिक उपलब्धिया सही है लेकिन उनके ग्रोथ वाले बदलाव ने लोगो को निराश किया है. सच्चाई यह है की छोटे ग्रोथ के हिसाब से मोदी का नोट बंदी का फैसला बेकार साबित हुआ. नगदी आधारित कमर्शियल एक्टिविटी ठप होने की वजह से गरीब तबके पर इस फैसले की सबसे ज्यादा मार पड़ी.


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