नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी आवाज़ें बहुत ‘डिफेंसिव’ हो गई थीं. छात्रों के मुद्दे पर ये आवाज़ें फिर से बुलंद हुई हैं. पिछले दो साल में लव जिहाद, घर वापसी और फिर गौरक्षा के नाम पर संघ एक के बाद एक मुद्दे उठा रहा था.

जब भाजपा और संघ इन मुद्दों पर हावी होते नज़र आ रहे थे, तभी रोहित वेमुला की आत्महत्या और जेएनयू के मामले के बाद विपक्ष ख़ासा आक्रामक होता नज़र आ रहा है. आर्थिक सुधार के बाद देश का युवा नौकरी और उपभोक्तावाद में डूब चुका है. जेएनयू की राजनीति का चरित्र भी बहुत बदल चुका है.

लेकिन पिछले दिनों में जो महत्वपूर्ण हुआ है वो ये कि कन्हैया के भाषण की मार्फत लगता है कि एक छात्र नेता बहुत दिनों के बाद उभर कर आया है. जिनको कुछ भी लेना-देना नहीं है वामपंथ से, वो भी प्रभावित हुए हैं. बहुत साल बाद छात्र नेता के तौर पर रोहित वेमुला और कन्हैया जैसी लोग सामने आए.

ये दोनों ही मोदी सरकार की देन हैं. जेपी मूवमेंट के तीस-चालिस साल के बाद छात्र राजनीति में वैसे ही हालात देखने को मिल रहे हैं. बीजेपी के लिए हिंदुत्व और राष्ट्रवाद दोनों एक-दूसरे के पूरक रहे हैं. ये उनकी सैद्धांतिक लड़ाई रही है. संघ ने ओबीसी और दलित छात्रों को हिंदुत्व के दायरे में लाने की भरपूर कोशिश की है. लेकिन रोहित वेमुला के हादसे के कारण लगता है कि उनके इस प्रयास को धक्का लगा है.

दलित, पिछड़े और गरीब वर्ग के जो लोग विश्वविद्यालयों में आ रहे हैं, वे इन्हें चुनौती दे रहे हैं. सरकार की शिक्षा के क्षेत्र में नीतियों का विरोध हो रहा है और इसीलिए वो इतनी आसानी से कारगर नहीं हो पा रही हैं. लेकिन ये प्रतिरोध कितना सफल हो पाएगा, ये कह पाना मुश्किल है. बिहार में चुनावी हार के बाद लगा था कि संघ उन विवादित मुद्दों से दूर होगा जिनसे वो लंबे समय से जुड़ा रहा है, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

संघ सिर्फ चुनाव के लिए काम नहीं करता है. जब तक जेएनयू जैसी जगह हैं जो उसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठा सकती हैं, वो उन्हें दबाने की कोशिश करता रहेगा.

(वरिष्ठ पत्रकार मानिनी चटर्जी से बीबीसी संवाददाता वात्सल्य राय की बातचीत पर आधारित)


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