राज्यसभा में सांसद जावेद अख़्तर ने मंगलवार को अपने विदाई भाषण में एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी का नाम लिए बगैर उन पर हमला बोला.

साथ ही उन्होंने दक्षिणपंथी अतिवादियों की भी निंदा की. उनका कहना था कि भारत एक दोराहे पर है जहां उसे फ़ैसला करना है कि उसे धर्म-मज़हब की बुनियाद पर मुल्क की नींव खड़ी करनी है या धर्मनिरपेक्षता की बुनियाद पर.

पढ़े, राज्यसभा में जावेद अख़्तर के भाषण के ख़ास अंश-

अच्छा वक़्त-बुरा वक़्त कैसा भी हो गुज़र जाता है. ये छह साल भी गुज़र गए और ऐसे गुज़रे कि लगा मैंने छह बार आंखें झपकाई हैं लेकिन इस तेज़ी में भी जो मुझे देखने को मिला, वह मैं अपने दिल में संभालकर रखूँगा. मैंने प्रतिपक्ष के नेता और फिर सदन के नेता अरुण जेटली, कपिल सिब्बल, वृंदा करात, रविशंकर प्रसाद, रामगोपाल यादव को सुना…मशहूर शायद मजाज़ पहली बार एक मुशायरे में कश्मीर गए. किसी ने पूछा कि कैसा लगा कश्मीर. तो उनका कहना था – बीच में पहाड़ आ गए, वरना और भी देख सकता था. तो यहां कुछ स्थगन आ गए थे, वरना और भी तक़रीरें सुन लेता, लेकिन जितना सुना वह भी काफ़ी है.

यहां जब मैं आया तो खास मक़सद लेकर आया था. कुछ लेखकों और कंपोज़रों की समस्याएं थीं. मैं सोनिया गांधी से मिला जिन्होंने मुझे मनमोहन सिंह से मिलवाया. उनका कहना था कि विपक्ष से, भाजपा से बात कर लीजिए. मैं अरुण जेटली से मिला, जिन्हें पहले से इस समस्या का पता था. मुझे लगा कि काम हो जाएगा. मुझे मनमोहन सिंह की बात अच्छी लगी कि विपक्ष से बात कर लीजिए.

देखिए, सरकारें तो उन मुल्कों में भी होती हैं, जहां डिक्टेटरशिप होती है, जहां शेख और बादशाहत हैं. लेकिन उनमें और इसमें फ़र्क क्या है. वहां सिर्फ़ सरकार होती है, यहां सरकार और विपक्ष दोनों होते हैं. किसी ने सही कहा है – चमन में इख़्तलाते रंगो-बू से बात बनती है, हमीं हम हैं तो क्या हम हैं तुम्हीं तुम हो तो क्या तुम हो.

हम बड़े ख़ुशकिस्मत लोग हैं. हम शिकायत तो बहुत करते हैं लेकिन जो हमारे पास है उसका शुक्रिया अदा नहीं करते. जिसका हमें शुक्रिया करना चाहिए, वह है हमारा संविधान. ज़रा नज़र उठाकर देखिए. यहां से चलेंगे तो दूसरा लोकतंत्र हमें भूमध्यसागर के किनारे मिलता है. क्या बात है, क्या ताक़त है, जो हमें यहां मिलती है.

यह संविधान हमें लोकतंत्र देता है, लेकिन लोकतंत्र बगैर धर्मनिरपेक्षता के नहीं हो सकता और इसीलिए वह लोकतंत्र नहीं है. लोकतंत्र का मतलब क्या है कि ज़्यादा लोगों की जिस बारे में राय होगी, जिस तरफ बहुमत होगा वहब मानी जाएगी, जिस तरफ़ अल्पसंख्यक होंगे, वह नहीं मानी जाएगी. मगर लोकतंत्र मानकर चलता है कि यह बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक हमेशा के लिए नहीं हैं. ये हर मुद्दे पर बदलेंगे. अगर कोई ऐसी परिभाषा बना दी जाए कि यह बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक हमेशा के लिए हैं, तो लोकतंत्र तो उसी दिन ख़त्म हो गया.

हम अगर धर्मनिरपेक्षता की बात करें, उसे बचाने की कोशिश करें तो हम किसी एक वर्ग या दूसरे पर अहसान नहीं कर रहे हैं. हम को धर्मनिरपेक्षता इसलिए बचानी होगी कि इसके बगैर लोकतंत्र ही नहीं बन सकता लेकिन मैं विश्वास रखता हूँ कि यह हमारे देश में बहुत बड़ी कामयाबी है. जब हम आज़ाद हुए तो शायद एक पुल बनाने के क़ाबिल नहीं थे, आज हम एक औद्योगिक देश हैं. बहुत बड़ी ताक़त हैं, बहुत बड़ी कामयाबी है. शायद इससे भी ज़्यादा हो सकती थी, लेकिन जितनी है उतना भी बहुत है.

मगर सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि हमने जनतंत्र को इस धरती पर उतार लिया. उसकी जड़ें इतनी गहरी हैं कि उखड़ नहीं सकतीं. यह मुमकिन नहीं और ये बहुत बड़ा तोहफ़ा है, जो हमारे बुज़ुर्गों ने हमें दिया है. एक तरफ़ यह लोकतंत्र है और एक तरफ़ यह कमाल का संविधान और दूसरी तरफ़ ऐसा मुल्क, ऐसी आबादी जिसमें 50 फ़ीसदी 27 साल से नीचे है. जहां 33 करोड़ लोग नौजवान हैं. 10 से 25 साल के बीच हैं. एक यंग मुल्क है, जिसमें ऊर्जा है. इसके पास अच्छा क़ानून है, ऊर्जा है, इल्म है.

इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि मैं हिंदुस्तानी हूँ बल्कि मैं मानता हूँ कि औसत हिंदुस्तानी का आईक्यू बहुत अच्छा होता है. वह पढ़ा-लिखा न हो, वह गांव में रहता हो, वह ज़बान टूटी-फूटी बोलता हो, लेकिन उसके पास अक़्ल है, वह नादान नहीं है.

हर चीज़ हमारे हक़ में है लेकिन क्या वजह है कि दुनिया के सबसे ज़्यादा बेरोज़गार हमारे मुल्क में हैं. दुनिया के सबसे ज़्यादा टीबी के मरीज़ हमारे मुल्क में हैं. दुनिया का हर पांचवां बच्चा जो पांच बरस से पहले मरता है, हिंदुस्तानी होता है. क्या वजह है कि हर साल 50 हज़ार औरतें मामूली प्रेगनेंसी की गड़बड़ियों की वजह से मर जाती हैं. हमें यह सोचना होगा.

यह शक्ति, यह क़ानून, यह सिस्टम सब हमारे पास हैं और हम तरक़्क़ी और विकास करना चाह रहे हैं. मगर किसका विकास, किसके लिए और किसकी क़ीमत पर. विकास जीडीपी नहीं है. विकास है, ह्यूमन डेवेलपमेंट इंडेक्स. ब्राज़ील में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा निजी विमानों का बेड़ा है और उनकी एकतिहाई आबादी ग़रीबी रेखा के नीचे है. यह हमें अपने देश में नहीं चाहिए.

मैं विश्वास रखता हूँ कि कोई भी पार्टी हो चाहती यही है कि इस देश का भला हो. और हम ज़रा सा उठ जाएं, तो मैं देखता हूँ कि जहां ये समस्याएं हैं, बेरोज़गारी की, हॉस्पिटल की, दवा, स्कूल, कॉलेज के इन्फ़्रास्ट्रक्चर की, वहां हम अपनी ऊर्जा किन चीजों में लगा रहे हैं. वो क्यों बर्बाद हो रही है.

आए दिन कुछ ऐसी बात सुनने को आती हैं, जो न सुनते तो अच्छा था. अभी दो-तीन दिन पहले एक साहब आए हैं जिन्हें ये ख्याल हो गया है कि वे नेशनल लीडर हैं. हालांकि हक़ीक़त है कि हिंदुस्तान के एक राज्य आंध्र प्रदेश के एक शहर हैदराबाद के एक मोहल्ले के नेता हैं. उन्होंने यह कहा कि वे ‘भारत माता की जय’ नहीं कहना चाहते. इसलिए कि संविधान उन्हें नहीं कहता. संविधान तो उन्हें शेरवानी पहनने को भी नहीं कहता, टोपी लगाने को भी नहीं कहता.

मैं यह जानने में दिलचस्पी नहीं रखता कि ‘भारत माता की जय’ कहना मेरा कर्तव्य है या नहीं. यह मैं जानना भी नहीं चाहता. इसलिए कि यह मेरा कर्तव्य नहीं, मेरा अधिकार है. मैं कहता हूँ ‘भारत माता की जय’, ‘भारत माता की जय’, ‘भारत माता की जय’. ये कौन लोग हैं. मैं इस बात को और उनके इस ख़्याल को जितने सख़्त लफ़्ज़ों में मुमकिन है, जो बुरे न हों, निंदा करता हूँ. और मैं इतनी ही सख़्ती से एक और नारे की भी निंदा करता हूँ– मुसलमान के दो स्थान, क़ब्रिस्तान या पाकिस्तान.

अब हम रुक नहीं सकते. वक़्त रुकता नहीं. हमें फ़ैसला करना है. हम दोराहे पर हैं. अक़्लमंद वो है, जो तजुर्बे से सीखता है. उससे ज़्यादा अक़्लमंद वह है, जो दूसरे के तजुर्बे से सीखता है. देख लीजिए, जिन मुल्कों में धर्म का बड़ा बोलबाला है, जहां यह यक़ीन है कि जो हम कह रहे हैं, वही ठीक है- ‘सब तेरे सिवा काफ़िर आख़िर इसका मतलब क्या, सर फिरा दे इंसा का, ऐसे खब्ते मज़हब क्या.’ जिन मुल्कों में यह उन्माद है, वो कहां गए.

जहां धर्म या मज़हब के ख़िलाफ़ एक शब्द बोल दें तो ज़बान कटती है, वो मुल्क हमारी मिसाल बनने चाहिए या वो जहां हर तरह की आज़ादी है. जहां ‘लास्ट टैंपटेशन ऑफ़ जीसस क्राइस्ट’ भी बन सकती है. कौन से मुल्क सही हैं. कहां इंसान आराम से है, कहां मुश्किल में है. यह दोराहा है, जिसे हम फ्रिंज कहते हैं, वो दिन-ब-दिन बड़ी होती जा रही है और उसकी ज़रूरत नहीं है.

शायद मेरे कुछ दोस्त मुझसे नाराज़ होंगे, लेकिन यह मैं दिल से समझता हूँ कि इस सरकार में बड़े क़ाबिल लोग भी हैं, जो बहुत अच्छा काम करते हैं और कर सकते हैं. उनके ऊपर यह बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी है कि यह कथित फ्रिंज जो न सिर्फ़ मामूली नेता हैं, विधायक, सांसद और राज्य मंत्री भी हैं और कभी-कभी मंत्री भी हैं, उन्हें क़ाबू में लें.

मैं यही उम्मीद करूंगा कि विपक्ष की भी भूमिका है. इसलिए कि जो नौजवान हैं वो हमेशा नौजवान नहीं रहेंगे. जापान ये फ़ायदा खो चुका है, चीन इसे खो रहा है. आपके पास ज़्यादा से ज़्यादा 20 साल हैं. जब आपके पास ऊर्जा है. फिर आप एक पठार पर पहुँच जाएंगे, जहां कुछ देर रहेंगे. सौ-डेढ़ सौ साल बाद फिर ये हालात आएंगे.

तो विपक्ष को भी सोचना चाहिए और सरकार को भी कि यहां काम हो. स्थगन हमें आगे नहीं ले जाएंगे और यह ध्रुवीकरण भी हमें आगे नहीं ले जाएगा. एक ऐसा हिंदुस्तान बने और बन सकता है और बहुत मुश्किल नहीं है, आसान है, जहां हर सिर पर छत हो, हर बदन पर कपड़ा, हर पेट में रोटी हो. जहां हरेक के पास दवा हो, स्कूल हो, इलाज हो. सड़कें, बिजली, पुल हो. बस अगले चुनाव की परवाह मत करें, सब कुछ हो जाएगा. (BBC)


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