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नई दिल्ली | हमारे देश में लोकतंत्र कायम रखने के लिए चुनाव का प्रावधान है. जनता चुनाव के जरिये अपने प्रतिनिधि चुनती है. लेकिन क्या जनता क़ाबलियत के आधार पर अपने जन प्रतिनिधि का चुनाव करती है? इस सवाल का जवाब सबको मालूम है. हमारे देश में किसी जनप्रतिनिधि चुनने की पहली क़ाबलियत उसका धर्म और जाति है. धर्म के आधार पर पार्टिया प्रत्याशी चुनती है , जिस क्षेत्र में जिस समुदाय के ज्यादा वोटर होते है , प्रत्याशी भी उसी समुदाय का चुना जाता है.

इसके अलावा धर्म के आधार पर पार्टिया खूब वोट बटोरती है. उत्तर प्रदेश चुनाव नजदीक आते ही बीजेपी ने राम मंदिर मुद्दा फिर से जीवंत कर दिया. वोट के धुर्विकरण के लिए दंगे तक कराये जाते है. इन्ही चीजो को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका डाली गयी थी. इस याचिका में कोर्ट से गुहार की गयी थी की 20 साल पहले आये सुप्रीम कोर्ट के आदेश को निरस्त किया जाए और धर्म के आधार पर वोट मांगने को अपराध घोषित किया जाए.

इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की बैंच ने आज सख्त टिप्पणी की. चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर ने कहा की क्या धर्मनिरपेक्ष राज्य में किसी धरमनिरपेक्ष गतिविधि के लिए धर्म का इस्तेमाल करना उचित है? हमारे देश में चुनाव एक धरमनिरपेक्ष गतिविधि है, क्या इसमें किसी धर्म को मिलाना और धर्म के आधार पर वोट मांगने को चुनावी अपराध की श्रेणी में नही रखा जा सकता? कोर्ट ने कहा की चुनाव् और धर्म दोनों अलग अलग चीजे है, उनको साथ नही रखा जा सकता.

चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर ने कहा की सुप्रीम कोर्ट ने 20 साल पहले इस पर एक फैसला सुनाया था. पिछले 20 सालो में संसद ने इस पर कोई कानून नही बनाया है. आखिर किस बात का इंतजार हो रहा था , यही की इस बार भी सुप्रीम कोर्ट इस पर फैसला करे जैसे यौन शोषण केस में हुआ था. सुप्रीम कोर्ट इस मामले की अगली सुनवाई 25 अक्टूबर को करेगा.

दरअसल याची ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाल ये मांग की है की धर्म के नाम पर वोट मांगने को अपराध घोषित किया जाए और 20 पहले के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को निरस्त किया जाए. मालूम हो की 1995 मी सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी ही एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा था की हिन्दुत्व के नाम पर वोट मांगना अपराध की श्रेणी में नही आता क्योकि हिंदुत्व एक धर्म न होकर एक जीवन शैली है.


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