लोकसभा चुनाव से पहले दंगों के मार झेल चुके मुज़फ्फरनगर में विस्थापितों के हलात अभी भी जस के तस है, अपना घर छोड़कर टाट के झोपड़ों में ज़िन्दगी गुज़र बसर करते यह लोग असहाय से नज़र आते है, सियासी पार्टियों ने लोकसभा चुनाव के बाद से यहाँ मुड़कर नही देखा, कुछ एक समाजसेवी संस्थाओं ने ज़रूर इनके हक में आवाज़ उठायी लेकिन शोरगुल के बीच वो आवाज़ दब गयी.

दंगो में सबसे अधिक मार झेली है महिलाओं और बच्चो ने जहाँ महिलाओं की ज़िन्दगी बर्बाद हो गयी वहीँ बच्चो का भविष्य भी अंधकारमय नज़र आ रहा है. उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर ज़िले में शनिवार को मतदान होना है. यहां पहली बार वोट डालनेवाले मतदाताओं में कई मुसलमान लड़कियां हैं जो दंगों में विस्थापित होने के बाद नई बस्तियों में रह रही हैं.

पलड़ा गांव की ऐसी ही एक बस्ती में जब इन् लड़कियों के हाथों में कागज और कलम देकर कहा कि वो बताएं कि नई सरकार से वो क्या चाहेंगी.

पेश है उनकी ‘विश-लिस्ट’

आयशा
आयशा

आयशा: यहां आठवीं कक्षा के बाद भी मुफ्त शिक्षा देनेवाला सरकारी स्कूल बनना चाहिए.

हिना

हिना

हिना: फिलहाल आठवीं के बाद फीस देनी होती है और दो किलोमीटर दूर बने स्कूल तक आने-जाने का खर्च भी होता है, जिस वजह से मां-बाप बेटों को तो स्कूल भेजते हैं पर बेटियों का छुड़वा देते हैं.

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नाजिस्ता

नाजिस्ता

नाजिस्ता : औरतों के घर से बाहर नहीं जाने देते तो घर में ही रहकर सिलाई-कढ़ाई का काम या कम्प्यूटर ट्रेनिंग देकर उससे जुड़े रोज़गार के अवसर बनाने चाहिए.

नजमा

नजमा

नज़मा: गर्भवती औरतों की देखभाल, उन्हें अस्पताल ले जाने और उनके बच्चे का टीकाकरण करवाने का काम हर गांव में आशा वर्कर करती हैं. मेरे गांव में आशा वर्कर ही नहीं है.

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जैसमीन
जैसमीन

जैसमीन: आशा वर्कर के अलावा मेरे गांव में आंगनवाड़ी भी नहीं हैं. बच्चों की देखरेख और पोषण का काम करनेवाली आंगनवाड़ी वर्कर नियुक्त किए जाएं तो बहुत अच्छा होगा.

खुशनुमा
खुशनुमा

खुशनुमा: मैं चाहती हूं कि महिलाएं सुरक्षित हों और पुलिस का रवैया बदले.

शकीरा
शकीरा

शकीरा: सरकार को पुलिस को समझाना चाहिए कि वो औरतों की शिकायतों को संजीदगी से लें और अपनी ड्यूटी करने के लिए घूस की मांग ना करें.

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रुख़सार
रुख़सार

रुख़सार घर के अंदर भी तो हिंसा होती है. दहेज मांगने पर रोक हो और इसके नियम सख़्ती से लागू होना चाहिए ताकि उसकी वजह से होनेवाली घरेलू हिंसा रुके.


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