dalit_and_muslim_unity

उना कांड के बाद से ही देश भर में दलित-मुस्लिम एकता का नारा सुनाई दे रहा हैं जिसका असर आगामी यूपी विधानसभा चुनावों में भी देखने को मिलेंगा. एक तरफ मायावती की बसपा और दूसरी तरफ असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम दलित-मुस्लिम एकता पर जोर देती हुई दिखाई दे रही हैं.

अगर दलित-मुस्लिम वोट बैंक एक तरफ हो जाता हैं तो राज्य के सियासी समीकरण गड़बड़ा जायेंगे. इस वोट बैंक के दम पर 247 के करीब विधानसभा सीटें जीती जा सकती हैं.

इस समय प्रदेश में दलितों का अनुमानित वोट 21 फीसदी है. वहीं मुसलमानों का 19 फीसदी. ऐसे में दोनों एक साथ एक साथ आ जाएं तो कुल वोट 40 फीसदी हो जाता है. पिछले विधानसभा चुनाव के नतीजें देखें जाएँ तो समाजवादी पार्टी करीब 27 फीसदी वोट हासिल कर 226 सीटों पर जीत हासिल की थी. और यही स्थिति दिल्ली विधानसभा चुनावों में भी थी.

18 विधानसभा सीटों पर मुस्लिमों की जनसंख्या एक लाख से ज्यादा है. वहीं 23 सीटों पर मुसलमानों का वोट 75 हजार से अधिक इसके अलावा 48 सीटों पर मुसलमानों का वोट करीब 50 हजार से ऊपर है. यानी इन सीटों पर मुसलमान सिर्फ एक मुस्लिम उम्मीदवार को वोट दे तो वह आसानी से चुनाव जीत सकता है.

दूसरी तरफ 158 सीटों पर दलितों का वोट 50 हजार से ज्यादा है। यानी इन 158 विधानसभा सीटों पर दलित सिर्फ एक उम्मीदवार को वोट दें तो वह आसानी से जीत हासिल कर सकता है.

अगर इन सीटों पर दलित-मुस्लिम एक होकर सिर्फ एक उम्मीदवार को वोट दे तो आसानी से 247 सीटों पर कब्जा कर सकते हैं.

(नोट- ये आंकड़े प्रो. आर.आर.वर्मा द्वारा पेश किए गए हैं।)


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