poor student

एक तो गरीबी और उसपर पैदल चलकर कई किलोमीटर दूर स्कूल जाना और गरीबी इतनी की पैरो के लिए चप्पल खरीदने तक क पैसे नही. जी हाँ हम आपको किसी फिल्म की स्टोरी नही बता रहे है. हम आपको भारतीय समाज की हकीकत से अवगत करा रहे है जो अच्छा होने के इंतज़ार में रोज़ नए-नए सपने तो देख रही है लेकिन ज़मीनी हकीकत से रु-ब-रु नही होना चाहती.

एक गुरु अपने शिष्य को बस विद्यालय से सम्बंधित ज्ञान नहीं देता बल्कि उसे जीवन के हर मुश्किलों का सामान करने की हिम्मत देता है, और कभी कभी तो खुद उसकी हिम्मत बनकर उसे सहारा देता है .

यूं तो इतिहास में कई गुरु और शिष्य की कहानी हैं, जो हमने बीते काल में सुनी होंगी  परन्तु यहाँ बात एक ऐसे गुरु की हो रही है जिन्होंने ज्ञान के साथ साथ अपने शिष्य की नियमित स्कूल आने की लगन देख कर उसकी हिम्मत बनकर उसे सहारा दिया.

यह कहानी है उत्तरप्रदेश के बाँदा जिले के निशान्त चौरसिया की जो की पूर्व माध्यमिक विद्यालय चहितारा, क्षेत्र-बड़ोखर खुर्द, जनपद-बाँदा में प्रधानाचार्य के पद पर कार्यरित हैं.

सरकार ये जरूर सोचती है की बेटियों को पढाओ परन्तु उन्हे कहाँ विद्यालय जाना हैं कैसे जाना है ये नहीं सोचती .गरीबो के बच्चे इसी वजह से स्कूल जाने में असमर्थ होते हैं.

पूर्व माध्यमिक विद्यालय चहितारा, क्षेत्र-बड़ोखर खुर्द, जनपद-बाँदा में एक छात्रा जो की अत्यंत गरीब परिवार की थी वह हमेशा नंगे पांव स्कूल पढने आती थी इतनी गरीबी की चप्पल तक लाने को पैसे नही थे और पढाई में इतनी लगन की नंगे पैर भी नियमित रूप से स्कूल आना. उसका यह पढाई के लिए इस अवस्था में भी यह लगन गुरु से देखि न गयी उन्होने तुरंत ही उसे नई चप्पल लेके दे दी ताकि वह अन्य बच्चोँ की तरह स्कूल चप्पल में आ सके.

तोहफा चाहे जैसा भी हो परन्तु एक गुरु कभी नहीं चाहेगा की उसका शिष्य?शिष्या उससे ज्ञान प्राप्त करने में असमर्थ हो .

 


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