मैं अपनी ज़िंदगी डूबकर जी रहा हूं। ऐसी मुश्किलें मुझे नहीं रोक सकतीं।’

व्हीलचेयर पर सवार अहमद जब पहली बार क्लास लेने पहुंचे तो यही कहा था। उनके दोनों पैर और एक हाथ नहीं हैं।

कॉलेज में वो फुटबॉल के शानदार खिलाड़ी थे। 2008 में इज़रायल की बमबारी में अपाहिज हो गए। इलाज से छुट्टी मिलने के बाद अहमद ने दोबारा कॉलेज ज्वाइन किया, बाद में वहीं पढ़ाने लगे। फुटबॉल खेलना भी बंद नहीं किया।

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अहमद बहादुर हैं। वो कहते हैं, ‘मैं धूल और मलबों से निकले बच्चों को पढ़ा रहा हूं। हम उठ खड़े होंगे, हम संघर्ष करेंगे’

जिनके हाथ या पांव नहीं हैं, उनके लिए भी अहमद का पैग़ाम है, ‘ज़िंदगी से मुंह मोड़कर मायूसी को गले मत लगाओ। मायूसी में ज़िंदगी नहीं है और ज़िंदगी में कोई मायूसी नहीं होनी चाहिए।’

Content – Shahnawaz Malik

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Ahmed al-Sawaferi speaks with a student during the morning queue, March 18, 2015.  REUTERS/Suhaib Salem
Ahmed al-Sawaferi speaks with a student during the morning queue, March 18, 2015. REUTERS/Suhaib Salem
Ahmed al-Sawaferi makes tea before leaving his house in Gaza City, March 18, 2015.  REUTERS/Suhaib Salem
Ahmed al-Sawaferi makes tea before leaving his house in Gaza City, March 18, 2015. REUTERS/Suhaib Salem

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Ahmed al-Sawaferi pushes himself at an elementary school in Gaza City. REUTERS/Suhaib Salem
Ahmed al-Sawaferi pushes himself at an elementary school in Gaza City. REUTERS/Suhaib Salem

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फोटो – reuters


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